वर्षा की वैज्ञानिक परिभाषा
वर्षा– वर्षण या अवक्षेपण एक मौसम विज्ञान की प्रचलित शब्दावली है जो वायुमण्डलीय जल के संघनित होकर किसी भी रूप में पृथ्वी की सतह पर वापस आने को कहते हैं। वर्षण के कई रूप हो सकते हैं जैसे वर्षा, फुहार, हिमवर्षा, हिमपात और ओलावृष्टि इत्यादि। अतः वर्षा वर्षण का एक रूप या प्रकार है।
वर्षा का मापन
असल में वर्षा का मापन और कुछ नहीं सिंपल सा तरीका हैं जिसमें एक फ्लास्क या पात्र जिसका अनुप्रस्थ काट ऊपर से नीचे तक एक समान होता हैं और खुला मुंह भी अनुप्रस्थ काट के बराबर होता हैं। इसे बारिश में सीधा खड़ा रखने पर बारिश के बाद पात्र में भरे पानी की मात्रा की ऊंचाई कुल वर्षा की माप को बताती हैं अर्थात इसे हम यह समझ सकते हैं की एक खुला टैंक जो पैंदे से खुली सतह तक एक समान हैं, मे वर्षा के बाद जितने मिलीमीटर या इंच पानी भर जाता हैं वर्षा की नाप को दर्शाता हैं।

आइए और सिंपल तरीके से समझते हैं आपकी छत अगर एकदम प्लेन है थोड़ा सा भी ढलान नहीं हैं और दीवारें भी एकदम खड़ी हैं तो पानी निकासी के पाइप को पूरी तरह से बंद करके बरसात के बाद सिंपल से स्केल से नापने पर जो रीडिंग मिलीमीटर सेंटीमीटर या इंच में मिलती हैं वही वर्षा की कुल मात्रा है।
वर्षा मापी यंत्र कोई विशेष वैज्ञानिक उपकरण नहीं हैं। यह सिंपल सा बेलनाकार फ्लास्क होता हैं। जिस पर मिलीमीटर या सेंटीमीटर में रीडिंग या पैमाना अंकित होता हैं। इस फ्लास्क की मोटाई अंदर से ऊपर से नीचे तक एक समान होती है या जिसके ऊपर एक कीप रखा जाता हैं जिसके खुले मुंह का क्षेत्रफल ज्ञात होता हैं और फ्लास्क जो बेलनाकार होता हैं उसके अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल भी ज्ञात होता हैं।
इसको वर्षा के दौरान खुली जगह पर रखने पर फ्लास्क में जितना पानी भरता हैं उस रीडिंग से, फ्लास्क के अंदर के अनुप्रस्थ काट से कीप के खुले मुंह के क्षेत्रफल के अनुपात का गुणा करने पर कुल वर्षा की मात्र प्राप्त होती है।

आइए इस गणित को विस्तार से उदाहरण के साथ समझते हैं मान लीजिए फ्लास्क या पात्र के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 2 वर्ग सेंटीमीटर हैं और फ्लास्क के ऊपर रखे कीप के खुले मुंह का क्षेत्रफल 5 वर्ग सेंटीमीटर हैं और फ्लास्क में अगर 15 मिलीमीटर ऊंचाई तक पानी इकट्ठा हुआ तो 15x 2/5= 6 मिलीमीटर कुल वर्षा हुई।
सुविधा के लिए आधुनिक वर्षा मापी में रीडिंग फ्लास्क के अनुप्रस्थ काट तथा कीप के खुले मुंह के अनुप्रस्थ काट के अनुपात में ही लिखी जाती है, जिससे सीधे-सीधे रीडिंग देखकर बिना गणना के वर्षा के माप का पता चलता है।
आप कीप और फ्लास्क या पात्र के खुले मुंह का क्षेत्रफल निम्न सूत्र से निकाल सकते हैं क्योंकि कीप और फ्लास्क का खुला मुंह एक वृत्त के रूप में होता है।
किसी वृत्त का क्षेत्रफल निकालने का फ़ॉर्मूला हैः क्षेत्रफल = पाई (π) x त्रिज्या (r) का वर्ग. यानी, A = πr2. यहां, पाई का मान लगभग 3.14 या 22/7 होता है।
वर्षा को मापने वाले यंत्र को वर्षामापी कहते हैं। इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि प्लूवियोमीटर, ओम्ब्रोमीटर, हाइटोमीटर, और यूडोमीटर।
वर्षा मापन के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां
वर्षा मापी को जमीन थोड़ा लगभग आधा मीटर ऊपर स्थापित किया जाता है जिससे कि पृथ्वी की या किसी अन्य सतह से टकराकर पानी की बूंदे वर्षा मापी में नहीं गिरे और वर्षा के मापन को प्रभावित नहीं करें।
वर्षा मापी को एकदम खुले स्थान या खुली छत पर स्थापित करें जिससे कि वर्षा के दौरान हवा से आसपास के अवरोधों से वर्षा का मापन प्रभावित नहीं।
बरसात का मापन मौसम विज्ञान और जल संसाधन विभाग द्वारा सभी क्षेत्रों में विभिन्न वर्षा माफी इकाइयों से करते हैं।
भारत मे वर्षा से संबंधित कुछ तथ्यों के बारे में
भारत में सबसे ज़्यादा बारिश मेघालय के माउसिनराम में होती है। मासिनराम में सालाना औसतन 11,872 मिलीमीटर (467.4 इंच) बारिश होती और इसे पृथ्वी पर सबसे नम जगह माना जाता है। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी मासिनराम का नाम सबसे ज़्यादा नम जगह के तौर पर दर्ज है।
भारत में सबसे कम बारिश राजस्थान के जैसलमेर में होती है। जैसलमेर का औसत 165 एमएम बारिश होती है।
भारत में होने वाली बारिश का बंटवारा इस प्रकार है-

| क्र. स. | मानसून | समय | प्रतिशतता |
| 1 | दक्षिण-पश्चिम मानसून | जून से सितंबर | 75% |
| 2 | उत्तर-पूर्वी मानसून | अक्टूबर से दिसंबर | 13% |
| 3 | पूर्व मानसून चक्रवात | अप्रैल और मई | 10% |
| 4 | पश्चिमी विक्षोभ | दिसंबर से फ़रवरी | 2% |
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