डूम्सडे क्लॉक या प्रलय की घड़ी: विनाश से मात्र 90 सेकंड दूर।

डूम्सडे क्लॉक यानी प्रलय की घड़ी अथवा विनाश की घड़ी क्या है?
वैश्विक अशांति के इस वर्तमान दौर में हमें कई बार यह महसूस होता हैं कि हम लोग या हमारी वर्तमान सभ्यता तबाही के बहुत नजदीक हैं। कई देशों के मध्य चल रहे युद्ध कभी भी विश्व युद्ध का रूप ले सकते हैं। रूस यूक्रेन का युद्ध लगभग ढाई वर्षों से चल रहा हैं। साथ ही इजराइल हमास, इजराइल लेबनान और अन्य खाड़ी देशों के बीच विवाद बढ़ता जा रहा हैं। अक्सर न्यूज़ में आता रहता हैं कि आज इस देश में इस देश के ऊपर इतनी मिसाइल दागी। कई बार एक देश दूसरे देश को परमाणु हमले की धमकियां दे चुके हैं। ऐसे वातावरण में पृथ्वी पर हमारी वर्तमान सभ्यता कभी भी तबाह हो सकती हैं।


हम लोग इस तबाही के कितने नजदीक हैं? इस बात को नापने का वैज्ञानिकों ने एक पैमाना तैयार किया हैं जिसे डूम्स डे क्लॉक यानी प्रलय की घड़ी कहते हैं।


आइए हम डूम्स डे क्लॉक अथवा प्रलय की घड़ी के बारे में विस्तार से जानते हैं-
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1947 में वैज्ञानिकों के एक दल ने, जिसमें अल्बर्ट आइंस्टीन भी शामिल थे, साथ ही वे वैज्ञानिक शामिल थे जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के लिए परमाणु हथियार बनाने वाले प्रोजेक्ट में काम किया था, ने एक सांकेतिक घड़ी बनाई जिसमें रात के 12ः00 बजाने का मतलब हैं पृथ्वी का मानव जनित कारणों से समूल विनाश। रात्रि के 12ः00 बजने से जितने दूर रहेंगे उतने सुरक्षित रहेंगे और वैश्विक शांति बनी रहेगी। इस घड़ी के निर्माण का मूल श्रेय कलाकार मार्टिल लेंगडॉर्फ को जाता हैं। यह घड़ी शिकागो विश्वविद्यालय के केलर सेंटर में परमाणु वैज्ञानिकों के बुलेटिन कार्यालय में स्थापित की गई।
बुलेटिन का एटॉमिक साइंस नामक एक वैज्ञानिकों के समूह द्वारा डूम्स डे क्लॉक अथवा विनाश की घड़ी की सुइयों का स्थान निर्धारित करते हैं जिससे यह पता चलता है कि हम लोग विनाश के कितने नजदीक हैं रात के 12ः00 बजने में शेष समय सेकंड अथवा मिनट में यह दर्शाता है कि हम विनाश से कितने दूर हैं या विनाश के कितने करीब हैं?

अक्सर बोलचाल की भाषा में कहते हैं कि इसकी तो 12ः00 बज गई। किसी की 12ः00 बजना अर्थात एक प्रचलित मुहावरे के अर्थ में नष्ट होना या समाप्त होना या विनाश होना होता हैं। हम नहीं चाहते हैं कि किसी की भी 12ः00 बजे।

विनाश की इस घड़ी मे मानव द्वारा प्रेरित विनाश के निम्नलिखित कारकों को शामिल किया जाता है-
विभिन्न देशों के मध्य युद्ध
परमाणु हथियारों का उत्पादन व्यापार और परीक्षण एवं हमले
हाइड्रोजन बम से उत्पन्न खतरा
जलवायु परिवर्तन
अन्य मानव निर्मित कारण जैसे ए आई तकनीकी या अन्य तकनीकी का दुरुपयोग आदि।

विनाश की इस घड़ी में 1947 से लेकर अब तक सबसे ज्यादा प्रभाव परमाणु हथियारों के उत्पादन व्यापार और परीक्षण का पड़ा हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना हैं कि भविष्य मैं तकनीकी के दुरुपयोग जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक और वर्चुअल अथवा आभासी दुनिया जैसी तकनीक और जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग के परिणाम स्वरुप पृथ्वी का बढ़ता हुआ औसत तापमान मानव विनाश का मुख्य कारण हो सकता हैं।

वर्ष 2023 के लिए रूस यूक्रेन युद्ध के चलते और नाटो देशों के युद्ध में शामिल होने की संभावना से वैज्ञानिकों ने विनाश की घड़ी की सुइयों को विनाश से 90 सेकंड दूर यानी रात्रि के 11ः58ः30 पर रखा गया था।
वर्ष 2024 के लिए भी रूस यूक्रेन युद्ध तथा इजराइल हमास युद्ध तथा अन्य देशों के युद्ध में शामिल होने की संभावना के कारण विनाश की घड़ी की सुइयों को यथावत अर्थात विनाश से 90 सेकंड दूर रखा गया अर्थात केवल कैलेंडर में साल बदला लेकिन वैश्विक खतरे की स्थिति अभी भी वर्ष 2023 की तरह बनी हुई हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यानी 1947 में विनाश की घड़ी के प्रथम अनावरण से लेकर अब तक के इतिहास में हम विनाश के सबसे करीब हैं।

वर्ष 1947 से लेकर अब तक कुल 25 बार इस घड़ी का समय बदला जा चुका हैं।
आईए जानते हैं पिछले 77 वर्षों में हम कब-कब विनाश के कितने करीब और कब-कब विनाश से कितने दूर रहे हैं।

इमेज बीबीसी न्यूज़ से ली गयी है

सर्वप्रथम 1947 में द्वितीय युद्ध की समाप्ति के बाद इस घड़ी की सुइयों को विनाश से 7 मिनट दूर सेट किया गया था।

1949 में सोवियत संघ रूस द्वारा अपने प्रथम परमाणु परीक्षण के कारण इस घड़ी को विनाश से 3 मिनट दूर दर्शाया गया।
1953 में अमेरिका द्वारा प्रथम हाइड्रोजन बम के परीक्षण के कारण इस घड़ी को विनाश से 2 मिनट दूर रखा गया।

1963 में अमेरिका और सोवियत संघ रूस के बीच संधि से परमाणु प्रतिबंध के कारण इस घड़ी को आधी रात यानी विनाश से 12 मिनट दूर रखा गया।
1969 में अमेरिकी सीनेट द्वारा परमाणु अप्रसार संधि की पुष्टि के बाद प्रलय की घड़ी को आधी रात अर्थात विनाश से 10 मिनट दूर सेट किया गया था।
1972 में एंटी बैलिस्टिक मिसाइल संधि होने के कारण प्रलय की घड़ी को 2 मिनट काम करके 12 मिनट दूर सेट किया गया था।
1974 में भारत के प्रथम परमाणु परीक्षण के कारण विनाश की घड़ी को 9 मिनट दूर सेट किया गया था।
1981 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा सोवियत संघ के प्रति कठोर व्यवहार तथा ईरान इराक युद्ध, चीन के परमाणु परीक्षण आदि कारणों से घड़ी को विनाश से 4 मिनट दूर सेट किया गया था।
1989 बर्लिन की दीवार गिरने से इस घड़ी को विनाश से 10 मिनट दूर सेट किया गया।
1991 सोवियत संघ रूस के विघटन के बाद तथा शीत युद्ध की समाप्ति के कारण इस घड़ी को इतिहास में अब तक सर्वाधिक दूर 17 मिनट दूर सेट किया गया।
1998 में भारत तथा पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों के कारण इस घड़ी को विनाश से 9 मिनट दूर सेट किया गया।
2002 भारत-पाकिस्तान के मध्य तनाव के कारण तथा परमाणु हमले की आशंका के कारण इस घड़ी को विनाश से 7 मिनट दूर सेट किया गया था।
2007 उत्तरी कोरिया द्वारा परमाणु परीक्षण के कारण इस घड़ी को विनाश से 5 मिनट दूर सेट किया गया।

2012 में प्रथम बार विनाश की इस घड़ी में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देखा गया और इसे विनाश से 5 मिनट दूर सेट किया गया था।
2015 में जलवायु परिवर्तन के खतरे तथा कुछ देशों अमेरिका भारत चीन और रूस के परमाणु हथियारों के उत्पादन और व्यापार के कारण विनाश की घड़ी को विनाश से 3 मिनट दूर सेट किया गया था।
2020 परमाणु युद्ध और जलवायु परिवर्तन के कारण इस घड़ी को विनाश से 100 सेकंड दूर सेट किया गया था।
2021 मे कोरोना महामारी के कारण विनाश की घड़ी को 100 सेकंड दूर यथावत रखा गया।
2023 रूस यूक्रेन युद्ध और नाटो देशों के युद्ध में शामिल होने की संभावना तथा परमाणु हमले की संभावना के कारण इस घड़ी को इतिहास में अब तक विनाश के सबसे करीब मात्र 90 सेकंड दूर सेट किया गया।
2024 रूस यूक्रेन युद्ध इसराइल हमास हमले तथा विश्व युद्ध की आशंका से इस घड़ी को 90 सेकंड दूर यथावत रखा गया।

डूम्स डे क्लॉक के प्रदर्शन का उद्देश्य लोगों को डराना नहीं बल्कि लोगों में मानव जनित वैश्विक खतरों के प्रतिजागरू करना हैं।

क्या यह वैश्विक तनाव छठे सामूहिक विलोपन का कारण बनेगा?
अब तक कुछ पांच सामूहिक विलोपन हो चुके हैं जो सभी प्राकृतिक कारणों से हुए हैं। लेकिन छठे सामूहिक विलोपन का कारण मानव जनित हो सकता हैं, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना हैं। सामूहिक विलोपन से तात्पर्य है कि जैव विविधता का वैश्विक स्तर पर समूल विनाश हो जाना। वर्तमान वैश्विक अशांति और तनाव से यह प्रतीत होता हैं कि हमारा अस्तित्व कभी भी समाप्त हो सकता हैं। वैज्ञानिकों ने भी अनुमान लगाया है कि छठा सामूहिक विलोपन मानव जनित कारणों से होगा। वैसे तो जलवायु परिवर्तन को छठे सामूहिक विलोपन के लिए मुख्य कारण माना जा रहा हैं जो कि एक मानव द्वारा प्रेरित कारक है। लेकिन विश्व युद्ध और परमाणु हथियारों के उपयोग से भी मानव सभ्यता और अन्य प्रजातियों के नष्ट होने से इनकार नहीं किया जा सकता हैं।

निष्कर्ष-
पृथ्वी पर कई सभ्यताएं फली फूली और नष्ट होती आई हैं। अधिकांश बार ये सभ्यताएं प्राकृतिक कारणों से नष्ट हुई हैं। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में वैश्विक तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा हैं। परमाणु हथियारों का निर्माण व्यापार और प्रक्षेपण हमारी वर्तमान मानव सभ्यता को कुछ ही घंटे में तबाह करने की क्षमता रखता हैं। पृथ्वी पर अनगिनत वनस्पति और जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से सर्वाधिक विकसित मानव को माना जाता हैं। लेकिन मानव मस्तिष्क के निरंतर दुरुपयोग से आज दुनिया समाप्ति के कगार पर हैं। शांति के लिए विभिन्न वैश्विक समझौतों, परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करना, और संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से विभिन्न राष्ट्रों के बीच तनाव को समाप्त कर वैश्विक शांति स्थापित की जा सकती हैं।


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