छठा सामूहिक विलोपन

छठा सामूहिक विलोपन क्या है?


आजकल अक्सर न्यूज में देखने को मिलता हैं कि हम छठे सामूहिक विलोपन में प्रवेश कर चुके हैं तो आईए जानते हैं सामूहिक विलोपन होता क्या है?
यहां पर सामूहिक विलोपन का तात्पर्य जैव विविधता मे तीव्र गति से कमी या जीवों की प्रजातियों के विलोपन से हैं। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के समय से लेकर आज तक नई प्रजातियों की उत्पत्ति होती आई है और कई प्रजातियों का विलोपन भी समय के साथ होता रहा हैं और न ही यह कोई चिंता का विषय है क्योंकि ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर आज तक इसका विस्तार और परिवर्तन निरंतर जारी हैं। अतः किसी प्रजाति का विलोपन और किसी नई प्रजाति की उत्पत्ति इस परिवर्तन का हिस्सा हैं लेकिन यह दीर्घकालिक प्रक्रिया है। लेकिन इस दीर्घकालिक और निरंतर परिवर्तन के दौरान प्रजातियों के विलोपन को सामूहिक विलोपन नहीं कहते हैं यह दीर्घकालिक विलोपन एक सामान्य घटना हैं और इसे विलोपन की सामान्य दर कहते हैं।


विलोपन की सामान्य दर
पृथ्वी पर विलोपन की सामान्य दर प्रति 100 वर्षों में 10000 प्रजातियों में से एक या उससे कम प्रजाति का विलोपित होना सामान्य विलुप्तीदर दर कहा जाता हैं।


होमियोस्टैटिस क्या हैं?
जिस प्रकार हमारे शरीर के किसी अंग को चोट लगने पर धीरे-धीरे वह चोट लगा स्थान स्वतः ही ठीक होने लगता हैं उसी प्रकार प्रकृति में भी संतुलन बनाए रखने की प्रवृत्ति होती हैं जिसे होमियोस्टैटिस कहते हैं। अतः प्रकृति में किसी प्रजाति के विलोपित होने पर किसी नई प्रजाति की उत्पत्ति हो जाती है और प्राकृतिक संतुलन बना रहता हैं।

विलुप्त दर कैसे नापी जाती है?
प्रजातियों की विलुप्ती दर को प्रतिवर्ष प्रति मिलियन में नापा जाता हैं जो की 100 वर्षों में 10000 प्रजातियों में से विलोपित के बराबर होता हैं। वर्तमान की विलुप्त दर सामान्य से लगभग 1000 गुना अधिक हैं। अतः स्पष्ट है कि हम छठे सामूहिक विलोपन से गुजर रहे हैं। पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति से लेकर अब तक उत्पन्न प्रजातियों की कुल संख्या का लगभग 2% प्रजातियां ही वर्तमान में अस्तित्व मे हैं।


सामूहिक विलोपन किसे कहते है?
सामूहिक विलोपन का तात्पर्य रातों-रात या कुछ ही दिनों में पृथ्वी पर सभी जीवों के विनाश से नहीं हैं बल्कि व्यावहारिक रूप से यह बहुत धीमी प्रक्रिया हैं लेकिन भू वैज्ञानिक समय पैमाने पर बहुत तीव्र प्रक्रिया हैं। प्रजातियों के प्रतिस्थापन होने की तुलना में बहुत तेजी से विलुप्त होना अर्थात जैव विविधता में तीव्र गति से कमी आना सामूहिक विलोपन कहा जाता है इसे हम तकनीकी रूप से निम्न प्रकार से समझ सकते हैं-


सामूहिक विलोपन की परिभाषा
भू वैज्ञानिक समय पैमाने पर कम समय में पृथ्वी पर मौजूद प्रजातियों के तीन चौथाई यानी 75% या उससे अधिक प्रजातियों का विलोपन होना सामूहिक विलोपन कहा जाता हैं । भू वैज्ञानिक समय पैमाने पर इस अल्प समय का मान 2.8 मिलियन वर्ष हैं अर्थात 2.8 मिलियन वर्षों में यदि कुल विद्यमान प्रजातियों में से तीन चौथाई प्रजातियां विलुप्त होती है तो इसे सामूहिक विलोपन कहा जाएगा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि हम छठे सामूहिक विलोपन में प्रवेश कर चुके हैं अर्थात इससे पहले पृथ्वी पर पांच बार सामूहिक विलोपन हो चुका है आईए अब तक हुए पिछले पांच सामूहिक विलोपन के बारे में संक्षिप्त में जान लेते हैं-

  1. ऑर्डोविशियन – सिलुरियन विलुप्ति 445 मीलीयन वर्ष पहले, 85% प्रजातियों का विलोपन।
  2. डेवोनियन विलुप्ति 340 मीलीयन वर्ष पहले, 70% प्रजातियों का विलोपन।
  3. पर्मियन-ट्राइसिक विलुप्ति 250 मीलीयन वर्ष पहले, 95% प्रजातियों का विलोपन।
  4. ट्राइऐसिक – जुरासिक विलुप्ति 200 मीलीयन वर्ष पहले, 76% प्रजातियों का विलोपन।
  5. क्रिटेशियस-तृतीयक विलुप्ति 65 मीलीयन वर्ष पहले, 80% प्रजातियों का विलोपन।

ये पांचो सामूहिक विलोपन प्राकृतिक कारणों से हुए हैं लेकिन छठा सामूहिक विलोपन मानव जनित कारणों से शुरू हो चुका हैं यह पहला सामूहिक विलोपन हैं जो किसी प्रजाति विशेष के कारण हो रहा हैं। मानव जनित होने के कारण इसे एंथ्रोपोसीन सामूहिक विलोपन या भूगर्भिक समय पैमाने पर होलोसीन समयावधि में होने के कारण इसे होलोसीन सामूहिक विलोपन भी कहा जाता हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि छठा सामूहिक विलोपन 19वीं सदी के प्रारंभ से यानी लगभग सन 1800 से प्रारंभ हो चुका हैं।

छठे सामूहिक विलोपन के कारण

चरघातांकी की रूप से बढ़ती हुई जनसंख्या
पृथ्वी पर जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है और पृथ्वी पर कुल संसाधन नियत हैं। जनसंख्या की भोजन एवं आवास की आपूर्ति के कारण मनुष्य ने जंगलों का विनाश किया हैं जिससे जैव विविधता का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है।

मानव की उपभोक्तावादी और विलासितावादी प्रवृत्ति
वर्तमान युग में मानव अपनी आर्थिक संपन्नता के बलबूते पर मूल आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों का उपयोग कर रहा हैं एवं विलासिता के इस दौर में मानव प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भूलकर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहा है इससे प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ कई जीवों की प्रजातियां पर अस्तित्व का संकट पैदा हो गया हैं।

औद्योगिक विकास
विज्ञान के इस युग में दिन प्रतिदिन मानव जीवन को आसन बनाने के विकल्प ढूंढने का दौर निरंतर जारी है। इस हेतु औद्योगिक विकास पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ अन्य कई प्रकार के पर्यावरणीय दुष्परिणाम साथ लिए होता हैं। जैसे जंगलों को काटकर उद्योग स्थापित करना या फिर गैर जिम्मेदार तरीकों से प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन करना प्रकृति के लिए एक बड़ा खतरा हैं। जिससे जैव विविधता को स्पष्ट नुकसान हो रहा हैं। साथ ही औद्योगिक विकास से जलीय परितंत्रो में प्रदूषण से स्वच्छ जल पारिस्थितिकी तंत्रो में कई संवेदनशील प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। स्वच्छ जल पारिस्थितिकी तंत्र में कुल जलीय तंत्र की लगभग 25%जैव विविधता पाई जाती हैं जबकि यह पृथ्वी पर पाए जाने वाले कुल जल का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा रखते हैं।

मानव की हिंसक और मांसाहारी प्रवृत्ति
वर्तमान में हम देखते हैं कि चीन और कुछ अफ्रीकी देशों में मानव ने अपने भोजन के लिए कीड़ों मकोड़ों से लेकर बड़े जीव हाथी तक किसी को नहीं छोड़ा हैं। मानव द्वारा वन्य जीवों के शिकार करने के कारण जैव विविधता को चिंतनीय नुकसान हुआ हैं। साथ ही आर्थिक लाभ के लिए भी मानव वन्य जीवों की हत्या और और वन्यजीवों के उत्पादों का व्यापार करता है। प्रकृति की व्यवस्था में यह छेड़छाड़ भी सामूहिक विलोपन में योगदान दे रहा हैं।

भू उपयोग के स्वरूप में परिवर्तन
बढती जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति हेतु जंगलों को काटकर वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट करके कृषि की जा रही हैं साथ ही औद्योगिकीकरण एवं इंफ्रास्ट्रक्चर विकास हेतु बड़े पैमाने पर प्राकृतिक जंगलों को काटकर उन्हें आवासीय और औद्योगिक परिसर में बदला जा रहा हैं।

कृषि और प्राथमिक उत्पादकों में अत्यधिक रसायनों का प्रयोग
कृषि में अधिक उपज प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के हानिकारक रसायन पेस्टिसाइड, हर्बीसाइड, कृत्रिम हार्मोन, रासायनिक उरर्वकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहे हैं। जिससे जल वायु और मृदा तीनों प्रदूषण होकर कई प्रजातियों के विलोपन का कारण बन रहे हैं। इनमें से कई रसायन जो अजैवनिम्निकारक होते हैं जैवसंचयन का गुण दर्शाते हुए खाद्य श्रृंखला में स्थाई रूप से वृद्धि करते रहते हैं और अंततः खाद्य श्रृंखला के शीर्ष स्तरो के जीवों की मृत्यु का कारण बनते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग
अत्यधिक जनसंख्या और औद्योगिक विकास में पर्यावरण को लगातार प्रदूषित किया हैं तथा वायुमंडल में लगातार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या उत्पन्न हो चुकी हैं। पृथ्वी के औसत तापमान में यह अल्प वृद्धि भले ही हमें मामूली लगे लेकिन कई जीव जंतुओं की प्रजातियां शायद इसे स्वीकार नहीं कर पाए। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल आईपीसीसी 2022 की रिपोर्ट के अनुसार स्थलीय पारिस्थिति तंत्रों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक ताप वृद्धि से 3 से 14% प्रजातियों के विलोपन का खतरा हैं और 5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से 48% तक प्रजातियों के विलोपन का खतरा हैं। साथ ही ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री सतह में वृद्धि हुई हैं। जिससे कई तटीय और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र जल में डूबने से जैव विविधता को भारी नुकसान हुआ हैं।

वैश्विक अशांति
जैसा की वर्तमान के दौर में हम देख रहे हैं कि बड़े पैमाने पर व्यापक रूप से वैश्विक अशांति फैली हुई हैं कई देश आपस में लड़ रहे हैं ऐसे में विश्व युद्ध की आशंका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। इस वैश्विक अस्थिरता के दौर में हर कोई देश अपने हथियारों का प्रसार और परीक्षण कर रहा हैं। ऐसे खतरनाक हथियारों के हमले और परीक्षणों से जीवों की कई प्रजातियां स्थाई रूप से नष्ट हो जाती हैं। वर्तमान वैश्विक अशांति से मानव जाति अपने विनाश के बहुत करीब हैं इसके लिए हमारा आर्टिकल विनाश की घड़ी पढि़ए।

सामूहिक विलोपन के परिणाम


खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव
इस पृथ्वी पर किसी भी जीव की प्रजाति का अन्य प्रजातियों से बिना प्रतिक्रिया करके अस्तित्व में रहना असंभव हैं। अर्थात जीवों की एक प्रजाति अन्य प्रजातियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंध रखती है। इस श्रृंखला की एक भी कड़ी निकल जाने से पूरी श्रृंखला प्रभावित होती है और पूरी श्रृंखला नष्ट भी हो सकती हैं। क्योंकि प्रकृति में प्रत्येक प्रजाति की अपनी एक विशिष्ट भूमिका होती है जिसे कोई अन्य प्रजाति प्रतिस्थापित नहीं कर सकती हैं।
जैसे उदाहरण के लिए मधुमक्खी को खाद्य श्रृंखला से अलग कर दिया जाए तो संपूर्ण वनस्पति का परागण नहीं हो पाएगा और खाद्यान्न उत्पादन भी नहीं हो पाएगा। अतः मानव जाति के लिए आहार की उपलब्धता समाप्त हो जाएगी और इस तरह से संपूर्ण मानव जाति भी समाप्त हो जाएगी।

विभिन्न प्रकार के रोगों का विस्तार
जैव विविधता से कई प्रकार की औषधियां प्राप्त होती हैं। सामूहिक विलोपन से इन औषधियों के नष्ट हो जाने से मानव समाज में रोगों का इलाज नहीं हो पाएगा इस प्रकार संपूर्ण मानव जाति रोग ग्रसित हो जाएगी।

आक्रामक प्रजातियों का आगमन और विस्तार
जब कुछ प्रजातियां नष्ट होती हैं तो कुछ नई आक्रामक प्रजातियां जो बड़ी तेजी से फैलती हैं का विस्तार हो जाता है जो कि कृषि और अन्य उपयोगी प्रजातियों के लिए खतरा होती हैं।

पर्यटन पर प्रभाव
जैव विविधता को लेकर विश्व भर में बड़े स्तर पर पर्यटन उद्योग का विस्तार हैं और इस पर्यटन उद्योग पर मानव की आर्थिक निर्भरता भी पाई जाती हैं। जैव विविधता के विलोपन के साथ ही यह पर्यटन उद्योग भी समाप्त हो जाएगा।

मिट्टी के उपजाऊपन में कमी
कई सूक्ष्मजीव जो मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। इन जीवों की प्रजातियों के विलुप्त होने से मिट्टी का उपजापन कम होगा और उत्पादकता में कमी आएगी जो कि खाद्यान्न संकट उत्पन्न कर सकती हैं।

विलोपन को रोकने के उपाय

सतत विकास की अवधारणा
मानव जाति अपने उपभोग के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रही हैं। जिससे जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हैं। अतः सतत विकास की अवधारणा से प्राकृतिक संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग होगा जिससे वे हमेशा के लिए बचे रहेंगे इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों, जो जैव विविधता का मूल अधार है, को संरक्षित कर जैव विविधता को संरक्षित किया जा सकता हैं।

प्रजातियों का अध्ययन करना
विभिन्न प्रजातियों का अध्ययन कर उनकी जनसंख्या का डाटा संग्रहित करना तथा इसमें बदलाव हेतु जिम्मेदार कारकों की पहचान करना जिससे कि किसी भी नकारात्मक पहलू का शमन करके प्रजाति को खतरे से सुरक्षित रखा जा सके।

वन्य जीव व्यापार को प्रतिबंधित करना
वन्यजीवों का अवैध शिकार भोजन के लिए और वन्य जीव उत्पादों के व्यापार के लिए किया जाता हैं अतः वन्य जीवों की हत्या और व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण पाकर जैव विविधता को बनाए रखा जा सकता हैं।

तकनीकी का उपयोग
विलुप्त प्राय प्रजातियों का तकनीकी का उपयोग कर संरक्षित किया जा सकता हैं, जैसे जीन बैंक, क्लोनिंग, विभिन्न प्रकार की कृत्रिम प्रजनन की तकनीक आदि का उपयोग कर प्रजाति को संरक्षित करना।

वैश्विक स्तर पर साझा प्रयास
जैव विविधता को संरक्षित करने हेतु अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौता का बेहतर क्रियान्वयन करके जैव विविधता को संरक्षित किया जा सकता हैं।

मानवीय दृष्टिकोण अपना कर
मानव अपनी स्वाद लोलुप्तता के लिए जीवों की हत्या करता हैं। अतः जीवों के प्रति दया भाव रख कर जैव विविधता के संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है।

जनचेतना व जागरूकता
समाचार पत्रों, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया, विज्ञापनों, शिक्षण संस्थानों में विभिन्न कार्यक्रमों, स्लोगन लेखन आदि के माध्यम से जैव विविधता का महत्व समझा कर लोगों में जैव विविधता के प्रति संवेदनशील और नैतिकता की भावना जागृत करके जैव विविधता का संरक्षण किया जा सकता है।


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