
कृत्रिम खाद्य रंग
दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि चॉकलेट, कैंडी, आइसक्रीम, ज्यूस, कुरकुरे, केक, मिठाइयां आदि कई प्रकार के आकर्षक रंगों के साथ बाजार में उपलब्ध हैं। ये रंग इन खाद्य पदार्थों की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि खाद्य सामग्री मे रंग क्यों मिलाया जाता है? क्या इस रंग के स्वास्थ्य संबंधी नुकसान है? क्या यह रंग प्राकृतिक है? क्या यह रंग सरकार द्वारा खाद्य सामग्री हेतु अनुमत है?
आज के इस ब्लॉक में हम जानेंगे कि खाद्य रंग क्या होते हैं? इनका स्रोत क्या हैं? और उनके फायदे और नुकसान क्या है?
खाद्य रंग क्या है?
खाद्य रंग जिनको रंग योजक या कलर एडिटिव भी कहते हैं। खाद्य रंग वे पदार्थ होते हैं जो भोजन, पेय पदार्थ अथवा अन्य खाद्य सामग्री में रंग देने के लिए मिलाए जाते हैं। ये रंग खाद्य सामग्री को आकर्षक, सजावटी और सुंदर बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। ये खाद्य सामग्री के मूल स्वाद को बदल भी सकते हैं और नहीं भी बदलते हैं लेकिन खाद्य सामग्री के मूल रंग को पूरी तरह प्रतिस्थापित कर देते हैं। जिससे खाद्य सामग्री दिखने में सुंदर और अच्छी लगे। खाद्य रंग प्राकृतिक हो सकते हैं और रासायनिक या संश्लेषित भी हो सकते हैं। संश्लेषित रंगों को कृत्रिम खाद्य रंग या केमिकल युक्त खाद्य रंग भी कहते हैं। प्राकृतिक खाद्य रंगों से कोई स्वास्थ्य नुकसान नहीं होता है। प्राकृतिक रंग प्राकृतिक स्रोतों से जैसे चुकंदर से लाल रंग, हल्दी से पीला रंग, केसर से नारंगी रंग, पालक से हरा रंग आदि। कुछ प्राकृतिक रंगों के स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। जैसे ये एंटीऑक्सीडेंट, कैंसररोधी, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना आदि में मदद करते हैं। लेकिन अधिकांश रासायनिक खाद्य रंग स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
खाद्य रंग की आवश्यकता
खाद्य रंगों का उपयोग मुख्य रूप से खाद्य सामग्री को सुंदर, आकर्षक और सजावटी बनाने के लिए किया जाता हैं। जिसे देखकर लोगों को खाद्य सामग्री खरीदने और खाने का मन करे। सदियों से खाद्य सामग्री को सुंदर बनाने के लिए रंगों का प्रयोग किया जाता आ रहा है। पहले खाद्य सामग्री को सुंदर बनाने के लिए सिर्फ प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था लेकिन वर्तमान के वैज्ञानिक युग में कृत्रिम और केमिकल युक्त रंगों का प्रचलन बहुत अधिक बढ़ गया है। क्योंकि कृत्रिम रंग अधिक आकर्षक, चमकीले और स्थाई होते हैं तथा प्राकृतिक रंगों की तुलना में सस्ते और आसानी से उपलब्ध भी होते हैं। वैसे तो खाद्य सामग्री का मूल गुण स्वादिष्ट होना है और इसके बाद सुगंध और रंग को प्राथमिकता दी जाती हैं। लेकिन मानव स्वभाव ऐसा है कि हर चीज दिखने में सुंदर चाहिए भले ही उसके प्राकृतिक गुण नष्ट हो जाए। मानव के इसी स्वभाव का उपयोग खाद्य सामग्री प्रोसेसिंग उद्योग और विपणन में भरपूर किया किया जा रहा है। खाद्य सामग्री में रंगों के प्रयोग से उपभोक्ता आकर्षित होते हैं। जैसे यदि हमें आइसक्रीम खानी हो और एक आइसक्रीम अपने प्राकृतिक रंग के साथ और दूसरी रंग बिरंगी आइसक्रीम हो तो हम रंग बिरंगी आइसक्रीम खाना पसंद करते हैं।
वैसे देखा जाए तो क्योंकि खाद्य सामग्री का मूल उद्देश्य शरीर की पोषण आवश्यकता और स्वाद हैं। इस प्रयोजन में खाद्य रंग की कोई आवश्यकता नहीं है।
क्या खाद्य रंग नॉनवेज भी हो सकते हैं?
वैसे तो अधिकांश प्राकृतिक खाद्य रंग वनस्पति अर्थात पेड़ पौधों से प्राप्त किए जाते हैं, लेकिन कुछ खाद्य रंग कीड़े और शैवाल जैसे सूक्ष्म जीव जंतुओं से भी प्राप्त किए जाते हैं। अतः प्राकृतिक खाद्य रंग के नॉनवेज होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता हैं।
केमिकल युक्त खाद्य रंगों के दुष्परिणाम
विभिन्न लेखों, ब्लॉग्स और रिसर्च रिपोर्टों के दावों के अनुसार केमिकल युक्त अर्थात कृत्रिम खाद्य रंगों से कैंसर, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, व्यवहार संबंधित समस्याएं, श्वषन से संबंधी समस्याएं, एलर्जी, सूजन, कब्ज, उल्टी, दस्त आदि हो सकते हैं।
केमिकल युक्त खाद्य पदार्थों के दुष्प्रभाव सामान्यतः क्रॉनिक विषाक्तता की प्रवृत्ति के होते हैं। इस कारण ये तुरंत प्रभाव नहीं दिखाते हैं। यही कारण है कि खाद्य सामग्री में केमिकल युक्त रंगों का बढ़ चढ़कर प्रयोग हो रहा हैं। क्योंकि सामान्यतः केमिकल युक्त खाद्य रंगों के तुरंत दुष्परिणाम देखने को नहीं मिलते हैं इसलिए लंबे समय तक केमिकल युक्त खाद्य रंगों के शरीर में पहुंचने से इनके दुष्प्रभावों की पहचान करना भी बहुत मुश्किल होता हैं। क्योंकि लंबे समय के दौरान हमारे शरीर में कई और प्रकार की विषाक्तता भी प्रवेश कर चुकी होती हैं। तय सीमा से बहुत अधिक मात्रा में केमिकल युक्त खाद्य रंगों के प्रयोग से तुरंत गंभीर दुष्प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
खाद्य रंगो के दुष्परिणाम दीर्घकालिक प्रवृत्ति के होते हैं। इस कारण रिसर्च में भी यथार्थता की कमी होती हैं। लंबी अवधि के दौरान शरीर में और भी कई प्रकार की विषाक्तता पहुंच जाती हैं। इसी कारण दुनिया भर में केमिकल युक्त खाद्य रंगों पर पर्याप्त रिसर्च नहीं हुए हैं। विज्ञान और अनुसंधान अनवरत हैं। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में मानव जाति का ज्ञान अभी तक अपूर्ण है और अनंत तक अपूर्ण ही रहेगा। जैसे जिस वस्तु को पिछले 100 सालों से उपयोग में लिया जा रहा होता है तथा कुछ रिसर्च उसके लाभ भी बता चुके होते हैं, उस पर वर्तमान में रिसर्च करके उसके दुष्परिणामों की पहचान करके उसको प्रतिबंधित कर दिया जाता है। अतः कहा जा सकता है कि पर्याप्त रिसर्च के अभाव में केमिकल युक्त खाद्य रंग के दुष्परिणामों की सटीकता से पहचान करना अभी तक संभव नहीं हुआ हैं। लेकिन इतना तो तय है कि केमिकल युक्त खाद्य रंगों के कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं होते हैं जबकि कुछ खाद्य रंगों के दुष्परिणाम अवश्य होते हैं।
कृत्रिम खाद्य रंगों के उपयोग पर कॉमन सेंस या व्यावहारिक समझ
क्योंकि प्रकृति में सभी स्वाद और रंग प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं। सिर्फ प्राकृतिक रंगों से खाद्य सामग्री की बनावट और दिखावट सुंदर हो सकती हैं। केमिकल युक्त खाद्य रंगों के दुष्परिणाम हो या ना हो लेकिन इनके बिना प्रयोग किये कोई दुष्परिणाम नहीं हो सकते हैं इतना तो तय है। अतः एहतियात के तौर पर ही सही, केमिकल युक्त खाद्य रंगों के प्रयोग से बचने में ही समझदारी हैं।
केमिकल युक्त खाद्य रंगों पर वैश्विक दृष्टिकोण
दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग स्टैंडर्ड के अनुसार खाद्य रंगों का प्रचलन हैं । कुछ खाद्य रंग जो अमेरिकन स्टैंडर्ड में अनुमत हैं वही खाद्य रंग यूरोपियन यूनियन स्टैंडर्ड में प्रतिबंधित हैं। वर्तमान में खाद्य रंगों के मानकों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका का फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन FDA ही सर्वोच्च मान्यता वाले मानक तय करने वाली एजेंसी है।
केमिकल वाले खाद्य रंगों से कैसे बचें?
- केमिकल वाले खाद्य रंग प्राकृतिक रंगों की अपेक्षा अधिक गहरे और चटकीले होते हैं । अतः अधिक गहरे और चमकीले रंग वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बचें। जो खाद्य वस्तुएं अपने मूल प्राकृतिक रंग में उपलब्ध हैं उन्हें ही प्राथमिकता देवें।
- केमिकल वाले खाद्य रंग प्राकृतिक रंगों की अपेक्षा अधिक स्थाई होते हैं। समय के साथ में यह रंग हल्का नहीं पड़ता है। इस प्रकार स्थाई गहरे रंग वाली खाद्य सामग्री का सेवन करने से बचें।
- केमिकल युक्त खाद्य रंग में असामान्य सी गंध हो सकती है और स्वाद भी असामान्य हो सकता है। अतः हमेशा प्रयोग में ली जाने वाली खाद्य वस्तुओं में असामान्य गंध और स्वाद होने पर इनका सेवन नहीं करें।
- अपरिचित खाद्य वस्तुओं के सेवन करने से बचें।
- पैकेज्ड फूड के पैकेट पर इनग्रेडिएंट तथा एडिटिव कलर कोड की जांच करें।
- पैकेज्ड फूड FSSAI का लोगो देखें। बिना लोगो वाला खाद्य सामग्री प्रयोग में नहीं लेवें।
- यथासंभव घर पर बनी हुई खाद्य सामग्री का उपयोग करें।
- बच्चे रंग बिरंगी खाद्य सामग्री के प्रति जल्दी आकर्षित होते हैं। अतः उन्हें खाद्य रंगों के दुष्परिणाम समझाएं तथा यथासंभव बच्चों को केमिकल युक्त खाद्य सामग्री के सेवन से दूर रखें।
- प्रयोगशाला परीक्षण भी एक उपाय है लेकिन यह व्यावहारिक नहीं है।
खाद्य रंगों के अंतर्राष्ट्रीय कलर कोड
संयुक्त राज्य अमेरिका का फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेटिव US FDA कोड
खाद्य पदार्थों में उपयोग के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका मे स्वीकृत सात प्रमाणित रंग योजक हैं, जिन्हें
रंग योजक कहा जाता हैं। उनका उपयोग दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में भी किया जा सकता हैं।
- FD&C Blue Nos. 1 and 2,
- FD&C Green No. 3,
- FD&C Red Nos. 3 and 40,
- FD&C Yellow Nos. 5 and 6
- इनके अलावा एफडीए नियमों के अनुसार प्राकृतिक रंगों की घोषणा पैकेट पर करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन यह घोषणा अवश्य करनी होती है कि इसमें प्राकृतिक रंग मिलाया गया हैं।

यूरोपीय यूनियन खाद्य रंगों के कोड
इसके अनुसार E100 से E199 तक खाद्य सामग्री में प्रयुक्त रंगों के लिए कोड निश्चित हैं । जैसे कुछ प्रमुख रंगों के कोड इस प्रकार हैं यहां पर E से तात्पर्य यूरोप से हैं।
E102 (टाट्र्राजीन, पीला),
E110 (सनसेट पीला एफसीएफ, नारंगी),
E120 (कोचीनियल, लाल),
E122 (एजोरूबाइन, लाल),
E129 (एल्यूरा रेड, लाल),
E132 (इंडिगो कारमाइन, इंडिगो),
E133 (ब्रिलियंट ब्लू एफसीएफ, नीला),
E140 (क्लोरोफिल, हरा),
E141 (क्लोरोफिल के कॉपर कॉम्प्लेक्स, हरा),
E150 (कारमेल, भूरा)
भारत में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) 8 रंगों का उपयोग खाद्य, दवाई और सौंदर्य प्रसाधन में करने हेतु अनुमति देता है। ये आठ कलर और उनके जोखिम नीचे सूची में दिए गए हैं-
- टाट्र्राजीन – अस्थमा, नाइट्रस व्युत्पन्न, जठरांत्र संबंधी, और पित्ती। टाट्र्राजीन के अधिक उपयोग से रजोनिवृत्त महिलाओं में प्राथमिक पित्त सिरोसिस का खतरा होता है।
- सनसेट येलो एफसीएफ – पित्ती, नाक बंद होना, एलर्जी, अति सक्रियता, सिरदर्द, क्षतिग्रस्त शरीर कोशिकाएं, गुर्दे के ट्यूमर और डीएनए क्षति।
- पोंसो 4आर – आर्किनोजेनेसिस, म्यूटाजेनिक, न्यूरोटॉक्सिक, प्रजनन विषाक्तता का कोई संकेत नहीं है।
- एरिथ्रोसिन – थायरॉयड ट्यूमर।
- इंडिगो कारमाइन – पित्ती, जीभ की सूजन, सांस लेने में कठिनाई।
- ब्रिलियंट ब्लू एफसीएफ – कैंसर, ट्यूमर, अति सक्रियता और अस्थमा।
- फास्ट ग्रीन एफसीएफ – ट्यूमर, त्वचा, आंखों, श्वसन और पाचन तंत्र की जलन।
- कारमेल – जीनोटॉक्सिसिटी, कार्सिनोजेनिसिटी, टॉक्सिकोकाइनेटिक, और प्रजनन विषाक्तता।
प्राकृतिक खाद्य रंग
प्राकृतिक खाद्य रंगों के उनके स्रोत के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया गया हैं। ये निम्नलिखित है-
1. कैरोटीनॉयड (E160, E161, E164), कैरोटीनॉयड हरे पौधों शैवाल और प्रकाश संश्लेषण करने वाले बैक्टीरिया से प्राप्त रंजक होते हैं। ये सामान्यतः विटामिन ए के स्रोत होते हैं। जैसे गाजर, पालक, हरी पत्तेदार सब्जियां आदि।
2. क्लोरोफिलीन (E140, E141), क्लोरोफिलीन हरा रंग देने वाला वर्णक हैं। ये हरे पौधों, शैवाल और साइनोबैक्टीरिया में पाया जाता हैं। यह एक अच्छा एंटीऑक्सीडेंट है और कोलेस्ट्रॉल कम करने में भी मदद करता है।
3. एंथोसायनिन (E163), एंथोसायनिन रंजक विभिन्न रंगों के फूलों और पत्तों से प्राप्त रंग होते हैं। एंथोसायनिन अंगूर, सेब, आलूबुखारा, गोभी, ब्लूबेरी, ब्लैकबेरी, रास्पबेरी और स्ट्रॉबेरी मे पाया जाता है।
4. बीटानिन (E162) बीटानिन एक लाल द्रव्य रंग है जो सामान्यतः चुकंदर से प्राप्त किया जाता हैं। यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है।
इनके अलावा करक्यूमिन (E100) जो हल्दी में पाया जाता है। राइबोफ्लेमिन (E101) पीला प्राकृतिक रंग है जो विटामिन B12 का स्रोत है और दूध, घी, खमीर और अंडे आदि में पाया जाता है।
निष्कर्ष
खाद्य सामग्री का मूल उद्देश्य शरीर के लिए पोषण है तथा स्वाद और इसके बाद सुगंध इसके मूलभूत गुण हैं। भले ही सदियों से खाद्य सामग्री को आकर्षक एवं रुचिकर बनाने के लिए खाद्य रंगों का प्रयोग किया जा रहा है एवं खाद्य सामग्री को लोक लुभावना बनाने और व्यापार बढ़ाने में खाद्य रंगों का विशेष महत्व हैं। लेकिन खाद्य सामग्री के मूल उद्देश्य में खाद्य रंगों का महत्व गौण हैं।
प्राकृतिक खाद्य रंगों के कोई दुष्परिणाम नहीं होते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। लेकिन केमिकल युक्त खाद्य रंगों के कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं होते हैं जबकि स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। वैज्ञानिक युग के वर्तमान के इस कालक्रम में भी सभी केमिकल युक्त खाद्य रंगों के दुष्परिणामों की सटीकता से पहचान नहीं हो पाई हैं।
सुझाव
प्रकृति ने हमें वे सब चीजें दी हैं जिससे हम किसी पदार्थ का प्रयोगशाला में संश्लेषण किए बिना भी समस्त खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। खाद्य सामग्री में कृत्रिम रंगों के प्रयोग से बचना चाहिए। फिर भी यदि आवश्यक हो तो प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग करें तथा केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग यदि करना पड़े तो अनुमत सीमा से कम ही करना चाहिए।
यदि आपका कोई खाद्य प्रसंस्करण उद्योग इकाई अथवा मिष्ठान भंडार या अन्य किसी भी प्रकार खाद्य सामग्री प्रोसेसिंग से संबंधित व्यापार हैं तो आप हानिकारक कृत्रिम केमिकल युक्त खाद्य रंगों का प्रयोग नहीं करें। आप अपने प्रतिष्ठान पर साइन बोर्ड या फूड पैकेट पर उल्लेखित कर सकते हैं कि इस खाद्य सामग्री में किसी भी प्रकार के कृत्रिम अथवा केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग नहीं किया गया हैं। सिर्फ प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग किया गया हैं। धीरे-धीरे स्वास्थ्य के प्रति लोगों में सजगता और जागरूकता बढ़ रही है अतः इससे आपका व्यापार कम नहीं पड़ेगा अपित और बढ़ेगा। लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी नहीं होगा।
Leave a comment