क्या 5जी रेडिएशन से गौरैया विलुप्त हो रही है?
जैसा कि हम देखते हैं कि विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म समाचार पत्रों आदि में 5जी नेटवर्क की टेस्टिंग के कारण पक्षियों विशेष तौर पर गौरैया का मरना बताया जा रहा है। आज इस पोस्ट में हम विस्तार से जानेंगे क्या गौरैया के विलुप्त होने और 5जी नेटवर्क का कोई कनेक्शन है अथवा यह एक मिथ है।
गौरैया बारे में सामान्य जानकारी
गौरैया अथवा घरेलू चिडि़या लोकप्रिय पक्षियों में से एक है। यह 3 से 4 इंच आकर की सफेद एवं धूसर रंग की चिडि़या होती है जो अक्सर हमारे घरों के आसपास पाई जाती हैं। हालांकी गौरैया ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक पाई जाती हैं। पूरे विश्व में इसका वितरण मिलता है। विश्व की लगभग हर प्रकार की जलवायु में यह चिडि़या पायी जाती है। यह विश्व के सर्वाधिक पाए जाने वाले पक्षियों में शामिल है। गौरैया मानव आवासों के आसपास रहना पसंद करती है। इसका मुख्य भोजन अनाज के दाने, घास के बीज और छोटे कीड़े मकोड़े होता है। नर गोरैया का पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से होती है।
गौरैया का वैज्ञानिक नाम पैसर डोमेस्टिकस है। गौरैया की कई प्रजातियां पाई जाती हैं इनमें से प्रमुख हैं हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो। आम बोलचाल की भाषा में हाउस पैरों को ही गोरैया कहते हैं।
आईयूसीएन के वर्गीकरण में इसे संकटमुक्त या लीस्ट कंसर्न (LC) श्रेणी में वर्गीकृत किया है। गौरैया और अन्य सामान्य पक्षियों की घटती संख्या के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनके संरक्षण के लिए प्रयास के लिए प्रतिवर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।
पिछले कुछ दशकों में गौरैया की संख्या में निरंतर कमी आने से हर कोई चिंतित हैं और इसके विलुप्ति के लिए कई कारणों को जिम्मेदार बताते हैं। गौरैया की संख्या में कमी के लिए वर्तमान में मुख्य कारण मोबाइल टावरों से निकले रेडिएशन को माना जा रहा है।

क्या मोबाइल रेडिएशन से गौरैया विलुप्त हो रही है?
कई लेखों, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्मों पर कई पक्षी प्रेमियों और पर्यावरण विश्लेषकों द्वारा यह दावा किया जाता आ रहा है कि पिछले कुछ दशकों में गौरैया की संख्या में बड़ी गिरावट की मुख्य वजह मोबाइल रेडिएशन है और 5जी टेस्टिंग से गौरैया को बड़ा नुकसान हुआ है। लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई है? क्या इन दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण हैं या यह एक मिथ है। इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं-
मोबाइल नेटवर्क रेडिएशन क्या होता है?
कोई भी दो डिवाइस को वायरलेस माध्यम से जोड़ने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन उपयोग किया जाता है। विभिन्न प्रकार की वायरलेस कनेक्टिविटी के लिए प्रत्येक प्रयोजन के लिए अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड्स निर्धारित किए जाते हैं। जिससे डिवाइस द्वारा सिर्फ उससे संबंधित रेडिएशन की पहचान कर उसे डीकोड किया जाकर मूल सन्देश मे परिवर्तित किया जाता है। हमारे चारों ओर हमेशा कई प्रकार के रेडिएशन हमेशा मौजूद होते हैं। निर्धारित मात्रा से अधिक रेडिएशन के संपर्क में लंबे समय तक रहने से विभिन्न स्वास्थ्य नुकसान हो सकते हैं और यह समस्त जीव जगत के लिए हानिकारक हो सकते हैं। लेकिन एक निश्चित मात्रा तक इससे कोई नुकसान नहीं होते हैं। मोबाइल नेटवर्क रेडिएशन से प्रजनन क्षमता में गिरावट, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, नपुंसकता, तनाव, आंखों की समस्या आदि समस्याओं के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन अभी तक इनकेे कोई स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
5जी नेटवर्क और गौरैया
वर्ष 2021 कई राज्यों में बर्ड फ्लू से कई पक्षियों की मौत हुई थी। उस समय में कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह दावा किया गया था कि जिओ द्वारा 5जी नेटवर्क की टेस्टिंग के कारण गौरैया और कई पक्षी मर रहे हैं। सच्चाई यह थी कि भारत में 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी वर्ष 2022 में की गई थी। उससे पहले किसी भी प्रकार की 5जी की टेस्टिंग भारत में नहीं की गई थी। 5जी नेटवर्क टेस्टिंग से पक्षियों का मरना एक अफवाह मात्र थी।
यूनिसेफ जो सबसे अधिकारिक, विश्वसनीय और प्रमाणित वेबसाइट यह बताती है कि
5जी – गलत सूचना जो अभी भी प्रसारित हो रही है-
यूनिसेफ के युवा रिपोर्टर हमें विशेषज्ञों के इस कथन की याद दिलाते हैं कि मोबाइल इंटरनेट की पांचवीं पीढ़ी जीवित दुनिया को नहीं मारती है, न ही यह वायरस फैलाती है।
यह सच है कि 19 अक्टूबर से 3 नवंबर 2018 के बीच हेग में कई सौ पक्षी और गौरैया मर गए। हालांकि, डच वन्यजीव स्वास्थ्य केंद्र, इरास्मस विश्वविद्यालय और गेन्ट विश्वविद्यालय द्वारा किए गए विस्तृत शोध में पाया गया कि पक्षियों की मौत 5 जी नेटवर्क के कारण नहीं हुई थी, बल्कि सबसे अधिक संभावना है कि जहर के कारण हुई थी।
विशेषज्ञों का दावा है कि 5जी एक सुरक्षित नेटवर्क है और पक्षियों की मौत और कोरोना वायरस के प्रसार के लिए इसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

UNICEF के इस विस्तृत आर्टीकल को पढने के लिए यहाॅ क्लिक करें।
आईए जानते हैं गौरैया की संख्या में कमी आने के मुख्य कारण क्या हैं?
हैबिटाट लॉस अर्थात आवासों का नष्ट होना
पृथ्वी पर किसी भी जीव के विकास और उसकी संख्या में वृद्धि के लिए आवास परम आवश्यक हैं। गौरैया की संख्या में कमी आने का मुख्य कारण आवासों का नष्ट होना हैं। पहले अधिकांश कच्चे मकान होते थे जिनमें गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता था। लेकिन वर्तमान में आधुनिक स्थापत्य शैली से मकान के निर्माण में गौरैया को अपने घोंसले के लिए उचित वातावरण नहीं मिल पाता। इस प्रकार अनुकूल आवासों में कमी होना गौरैया की संख्या में कमी का मुख्य कारण है।
भोजन की अनुपलब्धता
प्राचीन समय में जब खेती मे अधिकांश काम मानव और पशु श्रम से किया जाता था जिसमे काफी समय लगता था। तब अनाज कई दिनों तक खेतों में पड़ा रहता था। खेत खलिहान में भी पर्याप्त संसाधन नहीं होने के कारण कुछ अनाज छूट जाता था। जो चिडि़याओं तथा अन्य पक्षियों के लिए भोजन के रूप में उपलब्ध होता था। कृषि में यांत्रिक संसाधनों के प्रयोग से अब खेतों में अनाज ज्यादा दिन तक पडा नहीं रहता है और उन्नत तकनीक होने के कारण कृषि अवशेषों के साथ अनाज के दाने भी उपलब्ध नहीं रहते हैं।
अनाज छोटे व्यापार में विनियम का एक माध्यम होता था। पंसारी की दुकान पर अनाज देकर सामान खरीदने के परंपरा होती थी। यह अनाज थोड़ा बहुत किसी न किसी रूप में चिडि़याओं और अन्य पक्षियों के लिए भोजन के रूप में उपलब्ध होता था जो आधुनिक शॉपिंग मॉल पद्धति से अब समाप्त हो चुका है।
घरों में अनाज भंडारण की पद्धतियों से भी गौरैया को भोजन मिल जाता था जो आधुनिक वेयरहाउस और स्टोर की पद्धति से अब समाप्त हो गया है।
गौरैया कुछ छोटे कीड़ों मकोड़ों को खाकर अपना भोजन प्राप्त करती है कृषि में रासायनिक कीटनाशक पेस्टिसाइड के प्रयोग से छोटे कीड़ों के नष्ट हो जाने से गौरैया को भोजन की कमी का सामना करना पड़ रहा हैं।
रसायनों का अत्यधिक प्रयोग
खेतों में विभिन्न रासायनिक कीटनाशक पेस्टिसाइड के अत्यधिक प्रयोग से छोटे कीट जो फसल को खाते हैं। उनके शरीर में ये कीटनाशक पहुंचकर खाद्य श्रृंखला के अगले स्तर में गौरैया के शरीर तक पहुंचाते हैं। इनमें से कुछ रसायन जैव संचयन और जैव आवर्धन का गुण दर्शाते हैं। एक निश्चित मात्रा से अधिक होने पर जीव की मौत का कारण बनते हैं। डीडीटी नामक रसायन जिसका प्रयोग घरों में मच्छर मारने के की दवा के रूप में किया जाता था। जैव आवर्धन से खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर संपूर्ण खाद्य श्रृंखला को नुकसान पहुंचता था। जिसे कई देशों में और बाद में भारत में भी प्रतिबंधित कर दिया गया गया था।
कबूतरों की संख्या में वृद्धि
घरों में जहां पहले गौरैया रहती थी कबूतरों की संख्या में वृद्धि से गौरैया के आवासों पर कबूतरों ने कब्जा कर लिया है जिससे गौरैया को आवास उपलब्ध नहीं हो पता है।
औद्योगिक और अवसंरचनात्मक विकास
औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के कारण खेत और जंगल सीमित होते जा रहे हैं। जिससे गौरैया और अन्य जीवों को भोजन और आवास के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। साथ ही विकास के फल स्वरुप उत्पन्न हुए प्रदूषण से भी गौरैया और अन्य पक्षियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
छत के पंखों से टकराकर गौरैया का मरना
मानव निर्मित घरों में ही गौरैया का मूल आवास होता है। लेकिन खुले बरामदों और हाॅल में छत के पंखों से टकराकर घरों और कार्यालयों में गौरैया मर जाती है।
शिकारी पक्षियों द्वारा गौरैया का शिकार
कुछ शिकारी पक्षी जैसे शिखरा, बाज आदि गौरैया का शिकार कर लेते हैं। लेकिन यह एक प्राकृतिक और खाद्य श्रृंखला की आवश्यक गतिविधि है। अतः है यह ज्यादा चिंता का कारण नहीं है।
गौरैया नहीं होगी तो क्या होगा?
लोगों के दिमाग में यह प्रश्न आ सकता है कि अगर गौरैया नहीं भी रहे तो क्या होगा इसका जवाब इस प्रकार है-
प्रकृति में प्रत्येक जीव की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है जो किसी दूसरे जीव से किसी न किसी रूप से भिन्न होती है। अर्थात किसी एक जीव की भूमिका को किसी दूसरे जीव की भूमिका से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। अतः पारिस्थितिकी तंत्रो में खाद्य श्रृंखला में गौरैया की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। गौरैया खेतों में हानिकारक कीटों को खाकर फसलों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। चीन में 1958 में “गौरैया सफाई अभियान“ के दौरान गौरैया को मारने का परिणाम यह हुआ कि कीड़े बेतहाशा बढ़े, जिससे फसलें बर्बाद हुईं और लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ा।
घरों में गौरैया की उपस्थिति अपने आप में एक सुकून होता है। घरों मे गौरैया के होने से पक्षियों तथा अन्य जीवों के प्रति हमारा रुझान बढ़ता है तथा इससे प्रकृति में अन्य जीवों के महत्व को समझने में भी मदद मिलती है।
गौरैया बचाने के लिए क्या करें?
वैसे तो आईयूसीएन के वर्गीकरण में गौरैया को खतरे से मुक्त वाली श्रेणी में रखा गया है। लेकिन हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि पिछले कुछ दशकों में गौरैया की संख्या में भारी गिरावट आई है। अतःगौरैया को बचाने की आवश्यकता है। इसके लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं।
1 घरों में गौरैया के लिए कुछ स्थान छोड़ देना चाहिए।
2 गौरैया के लिए भोजन हेतु कुछ अनाज के दाने छत या उनके आवास के आसपास बिखर देना।
3 गर्मी के दिनों में गौरैया के लिए पीने के पानी की व्यवस्था करना।
4 खुले बरामदों में छत के पंखों के चारों ओर जाली लगाना जिससे गौरैया पंखे से टकराकर नहीं मरे।
5 कृषि में रासायनिक कीटनाशकों का कम प्रयोग करना।
6 घरों में गौरैया के लिए कृत्रिम प्लाइवुड या पेपर से निर्मित घोसलों की व्यवस्था करना।
7 गौरैया के प्राकृतिक आवासों से छेड़छाड़ नहीं करना।
8 जंगलों को काटने से बचाना एवं पेड़ पौधे लगाकर ग्रीन कवर बढ़ाना।
9 शिकारी पक्षियों आदि से गौरैया की रक्षा करना।
10 जीव जंतुओं के प्रति दया भाव एवं पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना।
निष्कर्ष
मोबाइल रेडिएशन से गौरैया या समस्त जीव जगत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन विभिन्न दावे सिर्फ अभी तक दावे ही हैं अभी तक मोबाइल रेडिएशन से गौरैया को नुकसान की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी यदि मान लिया जाए कि मोबाइल रेडिएशन से गौरैया को नुकसान होता है तो यह गौरैया को नुकसान पहुंचाने वाला मात्र एक कारण है। इसके अतिरिक्त कुछ कारण जो ऊपर पोस्ट में दिए गए हैं उन पर काम करके गौरैया को नुकसान पहुंचाने से बचाया जा सकता है।
इस पृथ्वी पर सभी जीवों को जीने का अधिकार है। मानव समाज को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे अन्य जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़े। यही हमारा धर्म है और भारतीय संविधान भी इसका समर्थन करता है। अतः एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में पर्यावरण के विभिन्न जैविक और अजैविक संसाधनों की रक्षा करनी चाहिए फिर चाहे वह गौरैया हो या अन्य जीव।
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