विलायती बबूल या अंग्रेजी कीकर

जब हम यात्रा करते हैं तब सड़क के किनारे कहीं ना कहीं एक झाड़ीनुमा, कांटेदार और हमेशा हरा भरा पेड़ अवश्य देखने को मिलता है। जहॉ और कोई वनस्पति नही होती है, वहॉ पर भी यह अच्छी तरह से फलता फूलता है। आज इसी पेड़ अर्थात विलायती बबूल या अंग्रेजी कीकर की चर्चा करते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोफिस जूलीफ्लोरा हैं।
इस पेड़ के उगने के कुछ नुकसान और कुछ फायदे हैं। अलग-अलग विश्लेषक इस पेड़ पर अपनी सकारात्मक और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं रखते आए हैं। कई पर्यावरणविद विलायती बबूल को एक भीषण और गंभीर पर्यावरणीय समस्या बताते हैं। आज की इस पोस्ट में हम विलायती बबूल के पक्ष और विपक्ष मे तर्क और तथ्यों के साथ विश्लेषण करेंगे।

विलायती बबूल का सामान्य परिचय

विलायती बबूल विश्व भर मे पायी जाने वाली प्रोसोफिस की कुल 44 प्रजातियों में से एक है। यह एक कांटेदार झाड़ीनुमा पेड़ होता है, जिसकी ऊॅचाई 3 से 10 मीटर तक होती है। यह एक तीव्र वृद्धि करने वाली आक्रामक विदेशी प्रजाति है जो सूखे अनावृष्टि आदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निरंतर वृद्धि करता रहता है। यह एक बबूल की प्रजाति है, जो वैज्ञानिक वर्गीकरण में फैबेसी परिवार का सदस्य है। राजस्थान के राज्य वृक्ष और धार्मिक महत्व रखने वाला खेजड़ी वृक्ष भी इसी परिवार के अंतर्गत आता है। इसकी पत्तियॉ खेजड़ी की तरह ही छोटी होती है। खेजड़ी की तरह ही इसमें भी लगभग 6 से 8 इंच लंबी फलियां लगती है जो लगभग मार्च अप्रैल में पक जाती है। पकने पर इन फलियों का रंग हल्का पीला हो जाता है।
यह एक सदाबहार वर्ष पर्यंत हरा रहने वाला पौधा है। सामान्यत इस पौधे की ऊंचाई और उम्र बढ़ाने के साथ-साथ कांटे कम होने लगते हैं और एक पूर्णतया वयस्क पेड़ कांटे रहित होता है।
विलायती बबूल शुष्क और अर्धशुष्क जलवायु क्षेत्र में पाया जाता है साथ ही लवणीय मृदा में जहां कोई भी वनस्पति नहीं पनपती, वहां पर भी विलायती बबूल उगने और वृद्धि करने में सक्षम होता है।
अत्यधिक गति से वृद्धि करने के कारण गुजरात में इस गांडो बावल अर्थात पागल बबुल भी कहते है।

विलायती बबूल का विस्तार


विलायती बबूल का विस्तार लगभग संपूर्ण विश्व में पाया जाता है। भारत में इसका विस्तार राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली आदि राज्यों में पाया जाता है। गुजरात के कच्छ के रन और राजस्थान के अरावली के पश्चिमी ढाल जो कि अर्धशुष्क मरुस्थल हैं, मे मुख्यतः पाया जाता है। अरावली के लगभग 38% क्षेत्रफल पर विलायती बबूल ने अपना कब्जा जमा लिया है। यह प्रजाति उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहॉ वार्षिक वर्षा 150 से 750 सेंटीमीटर तथा अधिकतम तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस रहता है। समुद्र तल से कुछ मीटर से लेकर 1200 मीटर की ऊंचाई तक विलायती बबूल का विस्तार देखने को मिलता है।

विलायती बबूल का इतिहास


भारत में सर्वप्रथम 1870 में वनस्पति विहीन क्षेत्र जैसे मरुस्थल, लवणीय भूमि, क्षारीय भूमि, समुद्र तटीय क्षेत्र आदि में लगाया गया। जो विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के होते हुए भी उम्मीद से कहीं गुना अधिक सफल रहा। बाद में इसका वृक्षारोपण मरुस्थलीकरण को रोकने हेतु किया गया जो उस समय तो सफलतम माना गया लेकिन बाद में समय के साथ धीरे-धीरे इसके तेज गति से वृद्धि करने और अन्य प्रजातियां को नुकसान पहुंचाने जैसे नकारात्मक कारणों की पहचान होने पर विलायती बबूल का वृक्षारोपण रोक दिया गया। वर्तमान में राजस्थान और कुछ अन्य राज्यों में विलायती बबूल के वृक्षारोपण पर रोक लगा दी गई है।
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार मेक्सिको से इस पेड़ के बीज मंगवा कर भारत में हवाई छिड़काव किया था। 1961 में वन विभाग द्वारा कच्छ के रन के विस्तार को रोकने के लिए विलायती बबूल का पौधारोपण किया गया था।

विलायती बबूल के नुकसान


विलायती बबूल पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्रो के लिए हानिकारक पौधा है। इसके कई हानिकारक प्रभाव देखे गए हैं। जो नीचे दिए गए हैं-

  1. विलायती बबूल एक आक्रामक प्रजाति है, जो तेज गति से वृद्धि करने वाला और तेजी से आसपास के क्षेत्र में फैलता है। जिससे वहां की अन्य स्थानीय प्रजातियों को उगने, वृद्धि करने के लिए स्थान, पानी और अन्य पोषक तत्वों के लिए विलायती बबूल के साथ प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है और इस प्रकार वहां की स्थानीय प्रजातियों विलुप्त हो जाती हैं।
  2. विलायती बबूल की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं तथा भूजल को तीव्र गति से दोहनकर भूजल स्तर में गिरावट का कारण बनता है।
  3. इस पौधे का कोई भाग वन्य जीवों और मवेशियों के खाने योग्य नहीं होता है तथा साथ ही झाड़ीनुमा होने से इसकी छाया भी जीव जंतुओं के लिए उपयोगी नहीं होती है। अत्यधिक तीखे और मजबूत कांटे होने के कारण वन्य जीव और मवेशियों के लिए यह पेड़ मुसीबत है।
  4. हाल ही मे मरू लोमड़ियों की संख्या मे भारी गिरावट का मूल कारण अत्यधिक विलायती बबूल का होना पाया गया।
  5. विलायती बबूल की छाया में घास नहीं उगती है। इससे चारागाह सीमित होते जा रहे हैं। शाकाहारी वन्यजीवों के साथ-साथ संपूर्ण खाद्य श्रृंखला नकारात्मक प्रभावित हो रही है। चारागाह सीमित होने से पशुपालन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है जिससे अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। गुजरात के बन्नी में घास की कई प्रजातियां विलायती बबूल के कारण विलुप्त हो चुकी है। कुछ पक्षी घास खाने वाले छोटे कीड़े मकोड़े जैसे टिड्डे इल्ली आदि खाते हैं तथा कुछ पक्षी घास के बीच खाते हैं, घास के मैदानों में कमी आने से पक्षियों की संख्या में भी गिरावट आई है।
  6. विलायती बबूल यद्यपि वर्ष पर्यंत हरा रहता है लेकिन यह नही के बराबर ऑक्सीजन देता है।
  7. खेतों की मेड़ों पर विलायती बबूल के उगने से इसके नीचे की जमीन अपनी उर्वरा शक्ति खो देती है, जिससे कृषि उत्पादन भी नकारात्मक प्रभावित होता है।
  8. सड़क के किनारे अत्यधिक विलायती बबूल के पेड़ होते हैं जो सड़क के मोड पर दूर तक देखने में बाधा उत्पन्न करते हैं इसके चलते कई बार सड़क दुर्घटनाएं भी होती है।

विलायती बबूल के फायदे


यद्यपि विलायती बबूल कई मायनो में हानिकारक है लेकिन इसके कुछ फायदे भी हैं जो नीचे दिए गए हैं-

  1. जलाऊ लकड़ीः तेज गति से वृद्धि करने के कारण विलायती बबूल अत्यधिक मात्रा में जलाऊ लकड़ी का उत्पादन करता है, जो उच्च कैलोरीफिक वैल्यू के साथ अच्छे ईंधन के गुण रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रो में लोग रसोई में ईंधन के लिए आज भी जलाऊ लकड़ी पर निर्भर हैं यद्यपि प्रधानमंत्री उज्जवला गैस योजना के बाद जलाऊ लकड़ी की मांग में गिरावट आयी हैं।
  2. बायोमास पावर प्लांट के लिए ईंधनः विलायती बबूल उच्च कैलोरीफिक मान वाली लकड़ी का उत्पादन तेजी से करता है। अतः विलायती बबूल की संपूर्ण लकड़ी बायोमास पावर प्लांट के ईंधन आपूर्ति के लिए उपयुक्त है।
  3. कोयला उत्पादनः विलायती बबूल की लकड़ी से कोयले का उत्पादन कर कोयले की आपूर्ति की जाती है क्योंकि कोयले का परिवहन लकड़ी से अधिक सहज और सस्ता होता है।
  4. गोंद उत्पादनः विलायती बबूल से अत्यधिक मात्रा मे गोंद का उत्पादन होता है जो विभिन्न गोंद उद्योग के लिए कच्चे माल का स्रोत है।
  5. केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केंद्र काजरी जोधपुर ने विलायती बबूल की लकड़ी के फर्नीचर निर्माण पर भी शोध किये एवं कुछ फर्नीचर के लिए विलायती बबूल की लकड़ी उपयुक्त पाई गई।
  6. विलायती बबूल की झाड़ी कांटेदार और सघन होती है जिससे कुछ पौधे जो प्राकृतिक रूप से उग जाते हैं। इन पौधों को मवेशियों सर्दीयों मे पाले और गर्मीयों मे लू से सुरक्षा मिलती है।
  7. विलायती बबूल के फूल मधुमक्खी पालन के लिए उपयुक्त होते हैं। अतः विलायती बबूल वाले क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन कर आर्थिक लाभ लिया जा सकता है।
  8. विलायती बबूल की लकड़ी कांटेदार होने के कारण खेतों के चारों ओर फेंसिंग अथवा बाढ़ हेतु उपयुक्त होती है जो आसानी से उपलब्ध और अन्य फेंसिंग उपाय से सस्ती होती है।

विलायती बबूल पर सरकार का रुख


राजस्थान सहित कई राज्य सरकारों ने विलायती बबूल के पौधारोपण पर रोक लगा दी है साथ ही विलायती बबूल के उन्मूलन का कार्य भी वन विभाग द्वारा किया जाता है। राजस्थान में विलायती बबूल की लकड़ी के परिवहन के लिए ट्रांजिट परमिट की आवश्यकता नहीं है।
वर्ष 2017 में वन विभाग राजस्थान सरकार ने विलायती बबूल की झाड़ियां को पेड़ में बदलने का प्रोजेक्ट शुरू किया था क्योंकि एक वयस्क पेड़ कांटेरहित होता है और फर्नीचर एवं अन्य प्रयोग हेतु पर्याप्त मोटाई की लकड़ी देता है।

निष्कर्ष


विलायती बबूल एक आक्रामक विदेशी प्रजाति हैं जो तेजी से वृद्धि के कारण स्थानीय प्रजातियों को तथा संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक है। यद्यपि इसके कुछ फायदे भी हैं लेकिन नुकसान की तुलना में नगण्य है। अतः अपने घरों, खेतों में इस पेड़ का पौधारोपण नहीं करें तथा आसपास विलायती बबूल के छोटे पौधे उग रहे हो तो उन्हें हटाकर उनके स्थान पर अन्य स्थानीय प्रजातियों का पौधारोपण करना चाहिए।


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