लैंटाना एक पर्यावरणीय समस्या

सड़क या रेल मार्ग द्वारा यात्रा के दौरान हम सड़क के दोनों और रंग-बिरंगे फूलों वाले झाड़ीनुमा पौधे को देख कर मन खुश हो जाता है। इसमें कई रंगों के रंग-बिरंगे फूल खिले हुए होते हैं तथा पौधा भी हमेशा हर रहता है। बरसात के दिनों में इसके रंग-बिरंगे फूल बहुत ही सुंदर और आर्कषक होते हैं। भारत के लगभग हर राज्य में यह सुंदर पौधा देखने को मिल जाता है। जी हां, आज हम बात कर रहे हैं लैंटाना की। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि कैसे एक सुंदर फूलों वाला पौधा पर्यावरण के लिए एक विकराल समस्या बन गया है। पर्यावरण विज्ञानियों ने लैंटाना को पर्यावरण के लिए कैंसर की संज्ञा दी है। आईए विस्तार से जानते हैं, लैंटाना क्या है? और पर्यावरण के लिए यह कितना नुकसानदायक है।

लैंटाना क्या है?

लैंटाना एक वर्ष पर्यंत हरा रहने वाला झाड़ीनुमा पौधा है इसकी ऊंचाई 2 से 3 मीटर तक होती है। अन्य वनस्पतियों और पेड़ पौधों के सहारे लगभग 6 मीटर तक ऊंचाई तक पहुंच सकता है। इसके तने और टहनियां छोटे कांटो युक्त होती है। यह एक आक्रामक प्रजाति है जो तीव्र गति से फैलती है जो अन्य स्थानीय वनस्पतियों के लिए खरपतवार है। लैंटाना व्यापक जलवायु परिस्थितियों के लिए अनुकूल है। लैंटाना में बहुत कम समय में इसका अपना पूरा जंगल बनाने की क्षमता होती है जिससे वहां की स्थानीय प्रजातियॉ नष्ट हो जाती हैं। लैंटाना का पौधा अच्छी रोशनी और खुले स्थलों पर झाड़ीनुमा होता है तथा छाया वाले स्थान पर यह बेल का रूप ले लेता है। लैंटाना से सर्वाधिक नुकसान घास के मैदानों को हुआ हैं।


लैंटाना का वैज्ञानिक नाम लैंटाना कैमारा है जो कि वर्बिनेसी परिवार की एक प्रजाति हैं। लैंटाना नाम, एक पेड़ विबर्नम लैंटाना के लैटिन नाम से लिया गया है, जिसके फूल लैंटाना से काफी मिलते जुलते हैं । कैमारा नाम इसके और कई अन्य पौधों के लिए एक स्वदेशी ब्राज़ीलियाई नाम से लिया गया है।


लैंटाना में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं इस आधार पर विश्व भर में लैंटाना की लगभग 50 प्रजातियां पाई जाती हैं। यह एक अमेरिकी उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की मूल प्रजाति हैं। अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य को लैंटाना का मूल स्थान माना गया है। इसलिए लेंटना को फ्लोरिडा फ्लावर भी कहते है। फ्लोरिडा में एक कस्बे का नाम भी लैंटाना इसी पौधे के नाम से पड़ा। इसका परागण मधुमक्खियों, भंवरों और छोटे कीटों द्वारा होता है तथा छोटे पक्षियों द्वारा इसके बीजों का प्रसार होता है। छोटे पक्षी इसके बीजों को भोजन के रूप में खाकर अन्य स्थानों पर मल उत्सर्जन के माध्यम से फैलाते हैं।

लैंटाना का विस्तार

वैसे तो यह पौधा अमेरिकी मूल का है लेकिन विश्व के लगभग 50 से अधिक देशों में इसका विस्तार मिलता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व के 33 प्रतिषत भू भाग पर लैंटाना ने अपना कब्जा जमा लिया है। भारत में इसका विस्तार लगभग संपूर्ण भारत में पाया जाता है। इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत के 44 प्रतिशत जंगल लैंटाना की चपेट में हैं।जो क्षेत्र लैंटाना से अभी तक बचे हुए हैं वहां पर भी बहुत जल्दी लैंटाना के पहुंचने की प्रबल संभावना है। पहली बार अमेरिका से बाहर लैंटाना को डच लोग यूरोप ले गए और इसकी व्यापक खेती की गई। इसके बाद 19वी सद़ी के प्रारंभ में भारत में यूरोप से कोलकाता बागवानी खेती के लिए लाया गया।

लैंटाना का प्राकृतिक आवास

लैंटाना का विस्तार वैसे तो पूरे विश्व भर में पाया जाता है लेकिन 45 डिग्री उत्तरी अक्षांश से लेकर 45 डिग्री दक्षिणी अक्षांशों तक इसके लिए विशेष अनुकूल जलवायु मिलती हैं। समुद्र तल से लगभग 1500 मीटर की ऊंचाई तक यह पौधा अनुकूलित है। 20 सेमी से लेकर 400 सेंटीमीटर तक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र लैंटाना के लिए अनुकूल है। लैंटाना कैमारा व्यापक पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होता है। जैसे अतिवृष्टि और अनावृष्टि में सहनशील, विभिन्न प्रकार की मृदाओं जैसे लवणीय और क्षारीय मृदा, दलदल वाली मृदा और षुष्क मृदा के प्रति अनुकूल, धूप और छाया दोनों के अनुकूल आदि।

पर्यावरणीय खतरा

जैव विविधता को खतरा

वर्तमान परिदृश्य में जैव विविधता को बहुत बड़ा खतरा लैंटाना से है। लैंटाना एक तेजी से फैलने वाली एक आक्रामक प्रजाति है। यह व्यापक पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं जो उस क्षेत्र की स्थानीय प्रजातियों के साथ प्रकाश, पानी, हवा और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा कर स्थानीय प्रजातियों को समाप्त कर देती हैं। लैंटाना जमीन के पोषक तत्वों का तीव्र दोहनकर भूमि को अनुपजाऊ बना देती है। यह प्रजाति भारत के लगभग 3,00,000 वर्ग किमी जंगलों तथा जैव विविधता के लिए ख़तरा बन चुकी है।


जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट करना

विभिन्न जीवों के लिए अपने आवास के लिए विशिष्ट पर्यावरणीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। लैंटाना के आक्रमण से वहां के पर्यावरणीय स्वरूप में व्यापक परिवर्तन हुए है जिससे जीवों के आवास स्थानांतरित अथवा नष्ट हो रहे हैं। यह भारत के बाघ निवास वाले क्षेत्र के 40 प्रतिशत क्षेत्र से अधिक हिस्से पर फ़ैल गया है। भारत में इससे शिवालिक पहाड़ियाँ, मध्य भारत और पश्चिमी घाट में नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व सबसे अधिक प्रभावित है।


घास के मैदाने का विलोपन

लैंटाना के आक्रमण से सर्वाधिक नुकसान घास के मैदानों को हुआ है। घास के मैदानों के अधिकांश क्षेत्र पर लैंटाना का कब्जा होने से शाकाहारी जीवों के लिए भोजन की अनुपलब्धता से शाकाहारी जीवों की खाद्य आपूर्ति बाधित हुई है।


शाकाहारी वन्यजीवों के लिए जहर

इसकी पत्तियाँ लैंटाडेंस नामक हेपेटोटाक्सिक पेंटासाइक्लिक के कारण जहरीली होती हैं। जो पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचती है। शाकाहारी जीव कई बार लैंटाना की पत्तियां खाकर बीमार पड़ जाते हैं, कई बार इसके कारण मौत भी हो जाती है। कुछ सालों पहले कान्हा नेशनल पार्क में 20 हिरनों की मौत का कारण भी लैंटाना की पत्तियां खाना था।


जंगली आग को बढ़ावा देना

लैंटाना के घने पत्ते सूख कर नीचे गिरते है जो भूमि पर सूखे पत्तो की परत बनाते है। जंगल में आग लगने पर ये सूखे पत्ते आग को तेजी से पूरे जंगल में फैलाते है साथ ही जमीन से कम ऊंचाई पर इसकी सघन टहनियां भी आग फ़ैलाने में मदद करती है। जंगल में बार बार आग लगने से क्षेत्र विशेष में पायी जाने वाली वनस्पति और जीवों की कई प्रजातियां स्थाई रूप से भी नष्ट हो जाती हैं।

वन्य जीव प्रबंधन में बाधा

लैंटाना की अत्यधिक सघनता के कारण वन्यजीव दूर से दिखाई नहीं देते है जिससे वन कर्मी या वन्य जीव प्रबंधकों को वन्य जीवो की ट्रैकिंग, मॉनिटरिंग के दौरान काफी समीप जाने पर पता चलता है, जिससे वन्य जीव के अटैक करने की आशंका बढ़ जाती है।

अन्य खतरे

  1. घास के मैदाने पर लैंटाना के आक्रमण से पशुपालन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। जिससे पशु उत्पादों के उत्पादन में कमी से पशुपालकों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
  2. लैंटाना के पत्ते जहरीले होते हैं जिन्हे खाने से मवेशियों की मौत होने के मामले निरंतर सामने आ रहे हैं।
  3. सड़क के किनारे मोड़ वाली जगह पर अत्यधिक लैंटाना होने से दृश्यता में बाधा उतपन्न होती है जिससे कई बार एक्सीडेंट हो जाते हैं।
  4. लैंटाना मिटटी से अत्यधिक पोषक तत्वों और जल का शोषण कर भूमि को ऊसर बना देता है एवं मिट्टी में पोषक तत्व चक्र को परिवर्तित कर देता है जिससे वहां पर अन्य कोई देशी पौधा नहीं पनप पाता है। जिससे भूमि कृषि योग्य भी नहीं रहती या कृषि उत्पादन में कमी हो सकती हैं।

लैंटाना के फायदे

लैंटाना मानव और पर्यावरण के लिए एक ज्वलंत समस्या है जिसके नुकसानों की चर्चा हम ऊपर कर चुके है लेकिन इसके कुछ फायदे भी है जो निचे दिए गए है-
1 जलाऊ लकड़ी
लैंटाना कम समय में तीव्र वृद्धि करके भारी मात्रा में जलाऊ लकड़ी का उत्पादन करता है। जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत रसोई ईंधन के रूप में काम में लिया जाता हैं। लैंटाना की लकड़ी आसानी से उपलब्ध होने के कारण जलाऊ लकड़ी के लिए वनों पर निर्भरता घटी हैं।
2 बायोमास ईंधन
अत्यधिक वृद्धि के कारण बड़ी मात्रा में बायोमास या जैव ईंधन का उत्पादन होता है। जिसे बायोमास ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के रूप में उपयोग कर बिजली उत्पादन किया जा सकता हैं।
3 छोटे पक्षीयों और कीटों के लिए आहार
लैंटाना के बीज छोटे पक्षियों द्वारा भोजन के रूप में खाये जाते है जो आसानी से उपलब्ध होते हैं।
4 मधुमक्खी पालन
लैंटाना के फूल मधुमक्खियों को आकर्षित करते है तथा मधुमक्खी पालन हेतु उपयुक्त होते हैं।
5 मृदा अपरदन को रोकना
लैंटाना की सघन जड़े सॉइल बाइंडर का कार्य करती है जो वर्षा जल के बहाव से मिटटी के कटाव को रोकने में सहायक है। साथ ही इसकी सघन पत्तियां वर्षा की बूंदो का वेग कम करके स्प्लैश इरोजन (छींटे से मिटटी के कटाव) को रोकती हैं।
6 प्राकृतिक सौंदर्य
लैंटाना के रंग बिरंगे मन मोहक चारो और फैले हुए फूल एक प्राकृतिक सौंदर्य का निर्माण करते हैं।
7 स्वास्थ्य लाभ
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार लैंटाना की पत्तियों में रोगाणुरोधी, कवकनाशी, और कीटनाशक गुण पाए जाते हैं। इसका उपयोग पारंपरिक हर्बल दवाओं में बुखार, त्वचा की खुजली, कुष्ठ रोग, चिकन पॉक्स, खसरा, अस्थमा और अल्सर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।
8 जैविक खाद
लैंटाना की पत्तियों का उपयोग जैविक कम्पोस्ट खाद बनाने में किया जा सकता हैं।
9 खेतों की फेंसिंग
खेतों की फेंसिंग के लिए लैंटाना की हेज लगाकर फेंसिंग की जा सकती है।

विलायती बबूल एक अभिशाप आर्टिकल पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें

लैंटाना पर सरकार का दृष्टिकोण

अधिकांश राज्यों की सरकारें लैंटाना से प्रभावित वनों से लैंटाना के उन्मूलन का कार्य कर रही है। सरकार इस पर प्रति वर्ष करोड़ों रूपये व्यय कर रही हैं। दुबारा ग्रोथ नहीं करे इसलिए लैंटाना को जड़ सहित निकालना पड़ता हैं। लैंटाना उन्मूलन का कार्य अत्यधिक महंगा हैं जो कॉस्ट बेनिफिट या लागत लाभ दृष्टिकोण से व्यवहारिक नहीं हैं। सघन लैंटाना हटाने का खर्च लगभग 40000 प्रति हैक्टर आता हैं। इसके अनुसार भारत की जीडीपी के बराबर राशि से भारत के मात्र 30 प्रतिशत क्षेत्रफल से ही लैंटाना हटाया जा सकता हैं। लैंटाना का प्राक्तिक पुनर्जनन (नेचुरल रीजनरेशन) इतना तीव्र हैं कि एक बार लैंटाना हटाने के बाद कुछ ही वर्षों में वह क्षेत्र पुनः लैंटाना से भर जाता हैं। केमिकल हर्बीसाइड आदि के स्प्रे से अन्य वनस्पतियों को खतरा होने से यह भी प्रयोग में नहीं लाया जा सकता हैं।


निष्कर्ष

लैंटाना के लाभों और हानियों का अध्ययन करने पर यह समझ में आता हैं कि हमारे चारों ओर खूबसूरत रंग बिरंगे फूलो वाला यह पौधा मानव और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। लैंटाना का आक्रमण पृथ्वी के वानस्पतिक स्वरूप को तेजी से बदल रहा है, जो कि गंभीर पर्यावरणीय समस्या हैं। यह किसानों और पशुपालकों के लिए विशेष खतरा है। अतः किसानों और पशुपालकों को जितना हो सके अपनी निजी भूमियों पर लैंटाना के प्रसार को रोकने के प्रयास करने चाहिए। सरकार और निति निर्माताओं को लैंटाना हटाने पर विचार करना चाहिए।


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