कबूतरों को दाना डालना: धार्मिकता बनाम स्वास्थ्य समस्याएं

पूरे भारत में कोई ऐसा गांव या शहर नहीं होगा जहां पर कबूतरों को दाना नहीं डाला जाता हैं। हमारे देश भारत में कबूतरों को दाना डालना एक धार्मिक और पुण्य का काम माना जाता हैं। कबूतरों को दाना डालना एक आस्था से जुड़ा हुआ मामला है साथ ही यह जीवों के प्रति दया भाव को भी दर्शाता हैं। लेकिन आजकल कबूतरों को दाना डालना बहस का विषय बन गया है। हाल ही में मुंबई हाई कोर्ट ने कबूतरों को दाना डालने वालों के खिलाफ FIR करवाने के निर्देश देने के बाद मामला अधिक चर्चाओं में आया। इससे पहले भी कहीं लोग और स्वास्थ्य सलाहकार कबूतरों से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर कबूतरों की बढ़ती संख्या पर चिंता जाता चुके हैं। आज की इस पोस्ट में हम विस्तार से जानेंगे की कबूतरों की बढ़ती संख्या और कबूतरों को दाना खिलाना किस प्रकार से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
कबूतर के बारे में सामान्य जानकारी
कबूतर संपूर्ण विश्व भर में पाए जाने वाले पक्षियों में से एक है। अत्यधिक ठंडे और बर्फीले स्थान को छोड़कर पूरे विश्व में कबूतरों की कई प्रजातियां पाई जाती है। यह कोलंबिडी कुल (गण कोलंबीफॉर्मीज़) की प्रजाति है। सामान्य कबूतर का वैज्ञानिक नाम कोलंबा लिविया है। कबूतर एक शांत स्वभाव वाला पक्षी है। यह मानव आवासों या आबादी क्षेत्र में रहना पसंद करता है अक्सर हमारे घरों में घोसला बनाते हैं। हालांकि कबूतरों की कुछ प्रजातियां जंगली भी होती हैं और कुछ प्रजातियां संकटग्रस्त भी हैं। लेकिन इस पोस्ट में हम सामान्य कबूतर जो आबादी क्षेत्र में पाया जाता है, केवल उसकी बात कर रहे हैं। कबूतर प्राचीन काल से ही एक पालतू पक्षी रहा है। प्राचीन काल में कबूतर का उपयोग संदेश वाहक के रूप में किया जाता था। कबूतर भोजन के रूप में अनाज के दाने, छोटे कीट और छोटे कंकड़ पत्थर खाता है। कबूतर झुंड में रहना पसंद करते हैं और घरों की छतों और बिजली के तारों पर अधिक समय व्यतीत करते हैं।
कबूतरों को दाना डालना एक धार्मिक आस्था का विषय
नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को महत्व देने वाले हमारे देश भारत में पुण्य और धार्मिक कार्यों में कबूतरों को दाना डालना सबसे लोकप्रिय काम है। पुण्य कामों में कबूतरों को दाना डालना इसलिए भी लोकप्रिय है क्योंकि यह सर्व सुलभ और आसान है। गांव और शहरों में जगह-जगह पर कबूतरखाने निर्मित है जहां पर प्रतिदिन सैकड़ो हजारों कबूतरों को दान डाला जाता है। सनातन धर्म में जीवों के प्रति दया भाव रखने पर विशेष जोर दिया जाता है। श्रीमद् भागवत गीता में एक श्लोक आता है “जीवेषु करुणा चापि मैत्री तेषु विधीयताम्।” जिसका अर्थ है जीवों पर दया करो और उनसे मित्रता करो। पौराणिक कथाओं में चंद्रवंशी राजा शिवि की कथा आती है, जिन्होंने एक कबूतर का पीछा करते हुए शिकारी को कबूतर के बराबर अपने शरीर का मांस तोल कर दिया था।
कबूतरों की संख्या में वृद्धि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक कैसे हैं?
कबूतरों को दाना डालना कबूतरों की संख्या में वृद्धि का एक मुख्य कारण है। आइए कबूतरों से होने वाले मानव और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव को निम्न बिंदुओं में समझते हैं-
सेहत के लिए खतरा
कबूतरों की बीठ, पंखों, शरीर या इन पर पाए जाने वाले परजीवियों के सम्पर्क में आने से कुछ विशेषतः श्वास सम्बन्धी बीमारियां फैलती है। इन्हें जूनोटिक डिजीज (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली) कहा जाता हैं। इनमें न्युमोनाईटिस, क्रिप्टोकोकोसिस, सालमोनोलोसिस हिस्टोप्लास्मोलोसिस टोक्सओप्लास्मोसिस, एवियन माईट इंफेक्शन, एलर्जी आदि बीमारियां कबूतरों के कारण इंसानों हो सकती हैं। इनमें फेफड़ों में में सूजन आती हैं और धीरे धीरे फेफड़े स्थाई रूप से कमजोर हो जाते हैं। जिन्हें लोग शुरू शुरू में जुकाम या अस्थमा समझते हैं। पहले ये बीमारियां पक्षियों के पालकों, जैसे मुर्गी पालकों में होती थी। लेकिन अब ये बीमारियां शहरी क्षेत्रों में आम हो चुकी हैं। इसका प्रमुख कारण कबूतरों की अत्यधिक संख्या होना हैं।
शहरों में ट्रैफिक असुविधा
सुबह सुबह शहरों में सड़कों और चौराहे पर कबूतर के दाना डालने वालों एवं बेचने वालों की भीड़ तथा सड़कों पर कबूतरों की अत्यधिक संख्या के कारण यातायात में असुविधा होती है। इस कारण कई बार सड़क दुर्घटनाएं भी हो जाती है।
पर्यावरणीय समस्या
खाद्य श्रृंखला में किसी एक स्तर पर उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ने से पारिस्थितिकी असंतुलन हो सकता है। प्रकृति में किसी विशेष स्थान पर एक निश्चित मात्रा से अधिक मात्रा में उपभोक्ताओं का होना उनमें प्रतिस्पर्धा बढ़ता है, साथ ही उस स्तर के अन्य जीवों को भी नकारात्मक प्रभावित करते हैं। किसी एक विशेष आवास स्थान पर जीवों की एक निश्चित संख्या ही जीवन यापन कर सकती है। किसी विशेष आवास स्थान या परितंत्र में जीवों की अधिकतम संख्या जो पोषण, आवास आदि के साथ साम्य बनाए रखते हुए जीवनयापन कर सकती हैं, उस स्थान विशेष की कैरिंग केपेसिटी या वहन क्षमता कहलाती हैं।
गौरैया की संख्या में कमी आना
गौरैया की संख्या में कमी आने का एक मुख्य कारण कबूतरों की संख्या बढ़ना हैं। क्योंकि कबूतर और गौरैया दोनों का आवास मानव निर्मित घरों में होता है। इससे इन दोनों चीजों में भोजन और आवास के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। जिसका सीधा नुकसान गौरैया को हुआ है। गौरैया के घोसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थान पर कबूतर घोसला बनाते हैं जिससे गौरैया को पर्याप्त आवास उपलब्ध नहीं होता है। गोरैया की विलुप्ति के कारण और बचाव के उपाय पर हमारा विस्तृत आर्टिकल पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
घरों में प्रदूषण
कबूतरों का आवास मानव घरों में होता है। जहां पर यह अत्यधिक मात्रा में मल, पंख आदि कचरा उत्सर्जित करते हैं। जिससे घरों में गंदगी और बदबू फैलती है, जो हमारे लिए असुविधा और सेहत के लिए भी हानिकारक होता हैं।
कबूतरों और उनके अपशिष्ट से कैसे बचें?
- घरों पर कबूतर जाली का प्रयोग कर खिड़कियों बालकनी आदि स्थानों को जाली से कवर करें।
- घर निर्माण के समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि कबूतरों के बैठने और घोसले बनाने के लिए स्थान नही रहे।
- घरों की छतों बालकनियों और खिड़कियों आदि की नियमित साफ सफाई करें।
- साफ सफाई करते समय मास्क और दस्तानों का प्रयोग करें।
- अपने घर के आसपास और घर की छत पर कबूतरों को दाना नही डालें।
- कबूतर नही पालें।
- कबूतरखानों और पक्षीघरों का निर्माण आबादी क्षेत्रों से दूर करें।
कबूतरों को दाना डालने के पक्ष में नैतिक तर्क
इस पृथ्वी पर सभी जीवों को जीने का अधिकार हैं। एक जीव को अन्य जीव से कोई हानि हो सकती हैं, इसका यह अर्थ कभी नही हो सकता हैं कि जो जीव हानि पहुँचा रहा हैं, उसको जीने का अधिकार नही हैं। प्रकृति में प्रत्येक जीव की एक विशिष्ट भूमिका होती हैं, जिसे अन्य जीव प्रतिस्थापित नही कर सकता हैं। अतः एक जीव का दूसरे जीव के साथ साम्य स्थापित कर सह अस्तित्व में रहना ही एक मात्र समाधान हैं।
जीव दया और परोपकार भारतीय सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, “दया धर्मस्य जन्मभूमि” और
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमई।।”
आदि श्लोकों में जीवों के प्रति दया और परोपकार को सर्वोच्च धर्म बताया गया है। इसके अनुसार कबूतरों को दाना डाल कर उनका पोषण करना एक नैतिक और धार्मिक कार्य हैं। मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण में प्रत्येक जीव के प्रति सहानुभूति रखना हमारा परम् कर्तव्य हैं। मानव के पास बुद्धि और संसाधन हैं जिनके बल पर वह सतर्क और सुरक्षित रह कर कबूतरों और अन्य जीवों का भी पोषण कर सकता हैं।
कानूनी प्रावधान
- भारतीय संविधान के मूल कर्तव्यों में अनुच्छेद 51A(g) में यह मौलिक कर्तव्य निर्धारित किया गया है कि वह 1 झील नदी और वन्य जीव सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करें तथा जीव मात्र के प्रति दया भाव रखें।
- कबूतर को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसूचित IV में रखा गया है इसके अनुसार कबूतर को शिकार के विरुद्ध सुरक्षा प्रदत्त हैं, अर्थात इसका शिकार प्रतिबंधित है।
- महामारी रोग अधिनियम 1897 के अंतर्गत कबूतरों से बीमारी फैलने के आधार पर कबूतरों को दाना डालने के विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है।
निष्कर्ष
कबूतरों के अपशिष्ट मल, पंख आदि से कई श्वसन सम्बन्धी समस्याएं हो सकती हैं। इनके हानिकारक स्वास्थ्य प्रभावों को ध्यान में रखते हुए इसने न्यूनतम संपर्क में आने के लिए उपयुक्त प्रबंध करने की कोशिश करनी चाहिए। ऊपर वर्णित कुछ बातों का ध्यान रखकर कबूतरों और इनके अपशिष्ट से न्यूनतम सम्पर्क में आते हुए भी धार्मिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करने हेतु इनको दाना डाला जा सकता हैं। जैसे सड़को, चौराहों और आबादी क्षेत्रों से दूर मास्क और दस्तानों का प्रयोग करते हुए दाना डालना चाहिए।
इस पोस्ट में कबूतरों को दाना डालने के पक्ष और विपक्ष में विस्तार से चर्चा की गई हैं। आशा है दोनों पक्षों पर विचार और तर्क करने में हमारी यह पोस्ट सहायक सिद्ध होगी। आप अपनी समझ के अनुसार निर्णय लेने हेतु स्वतंत्र हैं। पोस्ट से सम्बंधित किसी भी प्रकार के सुझाव के लिए कमेंट अवश्य करें।
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