सौर ऊर्जा : फायदे और नुकसान
जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ, मानव की ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता लगातार बढ़ी हैं। प्राचीन काल में केवल खाना पकाने और जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक रोशनी के लिए ही मुख्यतः ऊर्जा की आवश्यकता होती थी। जिसके लिए लकड़ी और सूर्य की रोशनी ऊर्जा के स्रोत होते थे।
वर्तमान विकास के दौर में मानव को जैसे-जैसे ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ी है वैसे-वैसे ऊर्जा के नए-नए स्रोत खोज निकाले हैं। विज्ञान के विकास के साथ साथ परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर गैर परम्परागत और नवीनीकरण ऊर्जा स्रोतों का प्रचलन बढ़ा हैं। वर्तमान में सौर ऊर्जा गैर परम्परागत और नवीनीकरण ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। लेकिन आज कल सौर ऊर्जा सयंत्रों की स्थापना के कुछ दुष्प्रभावों को लेकर बहस का विषय बन गया है। कई पर्यावरणविद भी सौर ऊर्जा सयंत्रों की स्थापना पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं।
आज इस ब्लॉग में हम सौर ऊर्जा सयंत्रों के पक्ष और विपक्ष में तर्क के आधार पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सौर ऊर्जा क्या है?

पूरे ब्रह्मांड में ऊर्जा का एकमात्र स्रोत सूर्य हैं। ऊर्जा के अन्य स्रोत सौर ऊर्जा के ही रूपांतरित रूप हैं। जैसे कोयले और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्माण भी लाखों वर्ष पहले सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर विकसित जैव भार(बायोमास) के पृथ्वी के उथल पुथल के दौरान गहराई में दबने और संपीड़न से हुआ है।
सूर्य ऊर्जा का अक्षय भंडार है। सूर्य में नाभिकीय संलयन अभिक्रिया के फल स्वरुप भारी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होती है। यही ऊर्जा विकिरणों के रूप में पूरे ब्रह्मांड में फैलती है। इसे हम सौर ऊर्जा कहते हैं। पृथ्वी पर समस्त जैविक तंत्रों के संचालन हेतु आवश्यक ऊर्जा के लिए सौर ऊर्जा ही एकमात्र आधार है। मानव अपनी विभिन्न ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए सूर्य से आने वाली विकरण ऊर्जा को अन्य रूपों में परिवर्तित करके उपयोग में लेता है। वर्तमान में सौर विकिरणों को विधुत ऊर्जा में रूपांतरित करके उपयोग में लेना सबसे लोकप्रिय और आसान तरीका है। सोलर पैनल जो फोटोवोल्टिक सेल से बने होते हैं, प्रकाश ऊर्जा को विधुत ऊर्जा में रूपांतरित करते हैं। हम सौर ऊर्जा का उत्पादन नहीं करते हैं बल्कि सौर ऊर्जा को अपने उपयोगी रूपों में परिवर्तित करते हैं।
सूर्य के पृथ्वी को कितनी ऊर्जा प्राप्त होती हैं?
सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी पर पृथ्वी के वायुमंडल के शीर्ष पर प्रति वर्ग मीटर औसत 1361 वाट प्रति सेकंड ऊर्जा प्राप्त होती हैं। इसे हम सौर नियतांक या सोलर कांस्टेंट कहते हैं। पृथ्वी के भौतिक स्वरूप में भिन्नता, विभिन्न मौसम की स्थितियां, सूर्य से पृथ्वी की दूरी, भूमध्य रेखा से दूरी आदि कारक सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा की मात्रा को निर्धारित करते हैं।
सौर ऊर्जा सयंत्र
फोटोवोल्टिक सेल से निर्मित सौर पैनलों को सूर्य की रोशनी वाले स्थान पर स्थापित करके बड़े पैमाने पर विद्युत ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है।
सौर ऊर्जा सयंत्रों के लाभ
1. निम्न संचालन और संधारण लागत
सौर ऊर्जा सयंत्र एक बार स्थापना के बाद बहुत कम अथवा न के बराबर संचालन और संधारण की आवश्यकता होती हैं। सौर ऊर्जा संयंत्रों के संचालन के लिए किसी भी प्रकार के ईंधन की आवश्यकता नहीं होती है और बहुत कम मानव श्रम लगता है। कोयला आधारित ताप संयंत्रों से बिजली उत्पादन का खर्चा लगभग 3-4 रुपए प्रति किलो वाट होता है। जबकि सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन का खर्चा 1 रुपए प्रति किलो वाट से भी काम होता है।
2. प्रदूषण मुक्त ऊर्जा
सौर ऊर्जा सयंत्रों में किसी प्रकार के ईंधन की आवश्यकता नही होती हैं। साथ ही सयंत्र स्थापना के बाद किसी भी प्रकार के माल आपूर्ति की आवश्यकता भी नही होती हैं। जिससे परिवहन से होने वाला प्रदूषण भी नगण्य होता हैं। अन्य परंपरागत स्रोतों से विद्युत उत्पादन CO2, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर और नाइट्रोजन के हानिकारक यौगिक उत्सर्जित कर पर्यावरण प्रदूषण करते हैं। सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन किसी भी प्रकार का उत्सर्जन नहीं करता है। अतः यह पर्यावरण को न्यूनतम क्षति पहुँचाता हैं। यह सतत ऊर्जा का स्रोत हैं। भविष्य के लिए संसाधन बचाने जैसी कोई चिंता नही हैं।
सतत विकास लक्षण को प्राप्त करने में सौर ऊर्जा संयंत्रों का योगदान
सतत विकास लक्ष्य संख्या 7 सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा को अर्जित करने में सबसे अहम भूमिका सौर ऊर्जा से विधुत उत्पादन की हैं। इसके अतिरिक्त भी कई अन्य सतत विकास लक्ष्य जैसे 3. अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण, 6. स्वच्छ जल और स्वच्छता 9. उद्योग नवाचार और बुनियादी ढांचा, 13. जलवायु परिवर्तन को रोकना, 14. पानी के नीचे जीवन 15. जमीन पर जीवन आदि की प्राप्ति में सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन का महत्वपूर्ण योगदान है।
3. दूरस्थ क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति
दूरस्थ क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति के लिए परंपरागत स्रोतों में ईंधन के परिवहन या विद्युत आपूर्ति के लिए ट्रांसमिशन लाइन पर बड़ा व्यय होता हैं। सौर ऊर्जा संयंत्र ऊर्जा आपूर्ति वाले स्थान या गन्तव्य स्थान पर स्थापित किए जाने के उपरांत किसी भी प्रकार के परिवहन या ट्रांसमिशन लाइन की आवश्यकता नहीं होती है। ट्रांसमिशन के दौरान भी ऊर्जा की हानि होती हैं। सौर ऊर्जा सयंत्र गंतव्य स्थल या उसके निकट लगने से ट्रांसमिशन छीजत और लागत दोनों बच जाते हैं। अतः सौर ऊर्जा संयंत्र दूरस्थ क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति का एक सुलभ साधन है।
सौर ऊर्जा सयंत्र की कमियां
1. अधिक भूमि की आवश्यकता
सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के लिए अन्य प्रकार से विद्युत उत्पादन की अपेक्षा अधिक भूमि की आवश्यकता होती है सौर ऊर्जा से एक मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए 4 से 5 एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। बड़े पैमाने पर 1 गीगा वाट के लिए लगभग 16-18 वर्ग किलोमीटर की आवश्यकता होती हैं। यह लगभग उतनी जमीन है जिस पर लगभग 1 लाख की आबादी वाला शहर बस सकता है।
2. निम्न ऊर्जा दक्षता
सूर्य से पृथ्वी पर प्रति वर्ग मीटर औसत 1361 वाट प्रति सेकंड ऊर्जा पहुंचती है। लेकिन सोलर पैनल की वर्तमान तकनीक से लगभग एक चौथाई ही विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। सौर ऊर्जा पैनल की दक्षता 25-15% ही होती है।
3. केवल दिन में उत्पादन
सौर ऊर्जा से विद्युत का उत्पादन केवल सूर्य की रोशनी में ही संभव है रात्रि के दौरान ऊर्जा हेतु अन्य संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। रात्रि के समय सौर ऊर्जा के उपयोग के लिए ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता होती है। जिसके लिए काफी महंगी और अधिक संख्या में बैटरियों की आवश्यकता होती है जो इसको काफी महंगा बना देता है।
4. मौसम पर निर्भरता
सौर ऊर्जा संयंत्र से कितना विद्युत उत्पादन होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूर्य की रोशनी कितनी मात्रा में प्राप्त हो रही है। बारिश के मौसम में बादल, सर्दी के मौसम में कोहरा और गर्मी के दिनों में आंधी तूफान से वायुमंडल में धूल आदि कणों की उपस्थिति सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। बारिश और अधिक बादलों की स्थिति में उत्पादन 90% तक घट जाता है।
5. दुर्लभ धातुओं के खनन और शोधन के दौरान प्रदूषण
सोलर पैनल के निर्माण के लिए कुछ दुर्लभ अर्धचालक धातुओं सिलिकॉन, जर्मेनियम, सिल्वर आदि की आवश्यकता होती है। जिनका खनन और शोधन काफी महंगी प्रक्रिया होता है। इसके दौरान काफी पर्यावरण भी प्रदूषण होता है।
सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना पर अन्य तर्क वितर्क
1. कुछ पर्यावरण विद् सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना के दौरान पेड़ काटने पर चिंता जताते हैं।
तर्क
सामान्यतः सौर ऊर्जा संयंत्र कम या पेड़ पौधों से विहीन जमीन पर ही लगाए जाते हैं। जिससे न के बराबर पर्यावरण क्षति होती है। यदि होती भी हैं तो यह ऊर्जा के अन्य विकल्पों की तुलना में नगण्य हैं। वर्तमान परिदृश्य में ऊर्जा हमारी मूलभूत आवश्यकता हैं। जैसे हम घर बनाते हैं तो घरों में भी फर्नीचर, खिड़की दरवाजे आदि के लिए कही न कही पेड़ काटे जाते हैं। पढ़ाई लिखाई के लिए पेपर की आवश्यकता होती हैं, इसके लिए भी पेड़ काटे जाते हैं। सड़क और रेलमार्ग के लिए भी पेड़ काटे जाते हैं।
तो क्या सौर ऊर्जा सयंत्रों पर पेड़ काटने का विरोध करने वाले घरों में नही रहते, कागज का उपयोग नही करते या सड़क का उपयोग नही करते?
बिना पर्यावरण की हानि के कोई भी विकास सम्भव नही है। लेकिन यह विकास सतत होना चाहिए और नुकसान तर्क संगत होना चाहिए। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक निश्चित सीमा तक पर्यावरणीय नुकसान पहुँचा कर उसे बाद में रिकवर किया जा सकता हैं। अतः सौर ऊर्जा सयंत्रों की स्थापना के दौरान पेड़ पौधों की हानि इसी सीमा के भीतर होती हैं।
2. सौर ऊर्जा संयंत्रों की साफ सफाई के लिए अत्यधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इस पर भी कुछ लोग चिंता व्यक्त करते हैं।
सौर ऊर्जा संयंत्र में सौर प्लेटों की साफ सफाई नियमित रूप से आवश्यक हैं, इसके अभाव में पैनल पर धूल मिट्टी जमकर उत्पादन को प्रभावित करती है। पैनल की साफ सफाई वहां की मौसम और भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। जैसे
- अधिक वर्षा वाले स्थान पर प्लेटों की सफाई स्वत ही हो जाती है।
2. धूल, आंधी और अधिक वायु प्रदूषण वाले क्षेत्रों में अधिक सफाई की आवश्यकता होती है।
तर्क
प्लेटों की साफ सफाई के लिए पानी की आवश्यकता होती हैं लेकिन यह थर्मल या परमाणु ऊर्जा सयंत्रों की तुलना में काफी कम हैं। मूलभूत आवश्यकता की आपूर्ति के लिए पानी का उपयोग तर्क संगत और सीमित मात्रा में किया जाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नही हैं।
इस पर चिंता जताने वाले इस उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे कार अपनी आवश्यकता है। कार को धोना भी आवश्यक हैं। लेकिन कम पानी से धुल जाए या धोने की आवश्यकता ही कम पड़े, ऐसे उपाय करना चाहिए।
3. सहारा मरुस्थल में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने से अमेजॉन के वर्षावन नष्ट हो जाएंगे।
सहारा मरुस्थल में आंधी तूफान चलते हैं। जिससे वहां की धूल मिट्टी के साथ फास्फोरस और अन्य पोषक तत्व अमेजॉन के वर्षा वनों तक पहुंचते है। जिससे वहां की वनस्पति को पोषण मिलता है। चिंता व्यक्त करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि सहारा मरुस्थल में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने से वहां से धूल मिट्टी हवा में नहीं उठ पाएगी इसका सीधा नुकसान अमेजॉन के वर्षा वनो को होगा।
तर्क
सहारा मरुस्थल अत्यधिक विस्तृत है यह पृथ्वी के 8% को भाग पर फैला हुआ है तथा इसका क्षेत्रफल 92 लाख वर्ग किलोमीटर है। इसके एक प्रतिशत क्षेत्रफल पर भी यदि सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है तो यह 5000 गीगावॉट अर्थात भारत, चीन और अमेरिका की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है। सहारा के बहुत कम लगभग एक प्रतिशत क्षेत्रफल पर ही पर्याप्त ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है इससे वहां से निर्गत फास्फोरस और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा और इससे अमेजॉन के वर्षा वन प्रभावित नहीं होंगे।
यह भी जानिए
- भारत की जून 2025 में कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 470 गीगावॉट है। जिसमे से सौर ऊर्जा से उत्पादन 116 गीगावॉट हैं।
- भारत का वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट नवीनीकरण ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हैं।
- भारत में सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा प्लांट भड़ला (जोधपुर) राजस्थान में है। इसकी क्षमता 2245 मेगावाट है।
निष्कर्ष
रोटी कपड़ा और मकान के साथ-साथ बिजली और पानी भी वर्तमान परिदृश्य में मूलभूत आवश्यकता है। पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव डालते हुए ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति का सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन सबसे उपयुक्त और सर्व सुलभ विकल्प है। सौर ऊर्जा उत्पादन के फायदे की तुलना में इसके नुकसान नगण्य हैं। अतः हमें परंपरागत स्रोतों पर निर्भरता कम करते हुए नवीनीकरण ऊर्जा स्रोतों को अपनाना चाहिए।
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