शाकाहार बनाम मांसाहार

शाकाहार बनाम मांसाहार हमेशा विवाद का विषय रहा है। हर कोई अपने अनुसार शाकाहार या मांसाहार के पक्ष और विपक्ष में अपने तर्क देता है। यह सर्वविदित है कि शाकाहार के विपक्ष में कोई विशेष तर्क नहीं है। विवाद हमेशा मांसाहार सही है अथवा नहीं है, इस पर होता आया है। कुछ भी हो लेकिन आजकल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोगों मे अनहेल्दी खाने का प्रचलन बढ़ गया है वहीं दूसरी ओर भोजन के प्रति लोगों में जागरूकता भी बड़ी हैं।
धीरे-धीरे लोगों को यह समझ में आ रहा हैं कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं हैं बल्कि यह स्वास्थ्य, शारीरिक और मानसिक ऊर्जा एवं संतुलन का आधार भी हैं।आयुर्वेद हो, धर्म ग्रंथ हो या विज्ञान हो, हेल्दी डाइट पर बल देते हैं। कई लोग मांसाहार छोड़कर शाकाहार और वीगन डाइट की तरफ बढ़ रहे हैं।
आईए आज हम विस्तार से इस विषय पर चर्चा करते हैं और निम्न प्रश्नों के उत्तर जानने की कोशिश करते हैं-
तो आइए उपरोक्त प्रत्येक प्रश्न का उत्तर विस्तार से जानते हैं-
शाकाहार और वीगन डाइट में क्या अंतर हैं?
वीगन डाइट में केवल पौधों से प्राप्त उत्पाद फल सब्जियां अनाज आदि शामिल होते हैं जबकि शाकाहार में वीगन के साथ साथ कुछ शाकाहारी पशु उत्पाद दूध, दही, छाछ, मक्खन आदि भी शामिल हैं अतः शाकाहार और वीगन डाइट में अंतर स्पष्ट हैं।
वीगन डाइट क्या है?
वीगन डाइट का सामान्य अर्थ शाकाहार भोजन से हैं लेकिन वीगन डाइट में केवल पौधों से प्राप्त उत्पाद फल सब्जियां अनाज आदि शामिल होते हैं इसमें जानवरों से प्राप्त किसी भी प्रकार के उत्पाद को शामिल नहीं किया गया हैं।
वीगन डाइट में आप क्या खा सकते हैं?
वीगन डाइट में आप केवल पौधों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं-
फल और सब्जियां
फलियां जैसे मटर, बीन्स और दालें
दाने और बीज
ड्राई फ्रूट्स
अनाज
डेयरी विकल्प जैसे सोयामिल्क, नारियल का दूध और बादाम का दूध
वनस्पति तेल।
वीगन डाइट में आप क्या नहीं खा सकते हैं?
वीगन लोग अंडा, मांस, मछली के अलावा जानवरों से बने किसी भी खाद्य पदार्थ जैसे पनीर, मक्खन, दूध, क्रीम, आइसक्रीम और अन्य डेयरी उत्पाद को नहीं खा सकते हैं। शहद को भी एनिमल प्रोडक्ट माना गया हैं अतः वीगन डाइट में शहद भी शामिल नहीं हैं।
प्रतिवर्ष 1 नवंबर को वीगन डे यानी शाकाहार दिवस मनाया जाता हैं।
ये क्रिकेटर शाकाहारी और वीगन डाइट फॉलो करते हैं-
विराट कोहली
शिखर धवन
रोहित शर्मा
मनीष पांडेय
भुवनेश्वर कुमार
महेंद्र सिंह धोनी
वीरेंदर सेहवाग
चेतेश्वर पुजारा
इशांत शर्मा
रविचंद्रन आश्विन।
विराट कोहली को जानवरों के प्रति दया भाव रखने के कारण वर्ष 2019 का पेटा पुरुस्कार दिया गया था।
मांसाहार की शुरुआत कैसे हुई?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण में मानव विकास के आरंभिक चरणों में मनुष्य जंगलों मे रहता था और भूख लगने पर प्रथम दृष्टि मे जो भी दिखाई देता वह उसे खा लेता था फिर चाहे वह वनस्पति हो या जानवर। लेकिन धीरे-धीरे मानव में बुद्धि का विकास होता गया और उससे यह समझ में आया कि यदि वह इन खाद्य वस्तुओं और जानवरों को पहले से स्टोर करके अपने पास रख ले तो भूख लगने पर उसे तुरंत भोजन प्राप्त हो जाएगा। इसी सोच ने आदिमानव को जानवरों को पालतू बना कर रखना सिखाया।
मांस खाने की परंपरा आदिकाल से हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि प्राचीन काल में मांस खाना मनुष्य की मजबूरी थी। क्योंकि उसे जीवित रहने के लिए और अन्य खाद्य संसाधनों के उत्पादन और भंडारण का ज्ञान नहीं था।
आज के युग में मनुष्य ने इतनी प्रगति कर ली हैं कि वह खाने के लिए आवश्यक संसाधनों का उत्पादन करने में सक्षम हैं अतः मानव विकास के इस युग में मनुष्य अपनी जरूरत और इच्छा के अनुसार खाद्य संसाधनों का उत्पादन करता हैं। वह चाहे तो शाकाहारी खाद्य संसाधनों का उत्पादन कर सकता है और वह चाहे तो मांसाहारी खाद्य उत्पादों का उत्पादन कर सकता है। अतः यह स्पष्ट हैं कि आधुनिक युग में मांसाहार मनुष्य की मजबूरी नहीं अपनी इच्छा हैं।
मांसाहार इतना लोकप्रिय क्यों हैं?
वैश्वीकरण और आर्थिक उन्नति ने मनुष्य को अपने स्वाद के अनुसार इच्छित भोजन करने की अनुमति दी हैं इसी का परिणाम है कि आज का मानव भोजन अपनी शारीरिक आवश्यकता के लिए नहीं अपितु स्वाद को अधिक प्राथमिकता देता हैं। इसके साथ ही औद्योगिकरण के परिणामस्वरूप मांसाहार उत्पादन का उत्पादन और विपणन आसान होना भी मांसाहार के प्रचलन को बढ़ता है।
सोशल मीडिया और विकसित संचार तंत्र भी एक दूसरे व्यक्तियों के विचारों को प्रभावित करता है और मांसाहार की लोकप्रियता के लिए यह भी एक जिम्मेदार कारक है।
मांसाहार को लोकप्रिय बनाने में बड़े सेलिब्रिटीज का भी योगदान रहता हैं क्योंकि उनके कहीं फॉलोअर्स डाइट में भी उनका अनुसरण करते हैं और ये बड़े सेलिब्रिटी अपने इंटरव्यू में बड़ी आसानी से बिना किसी हिचक के मांसाहार उत्पाद को अपना पसंदीदा भोजन बताते हैं।
मांसाहार का लोकप्रिय होने का एक कारण यह भी है कि विलासिता के इस दौर में हर कोई अपना स्टेटस दिखाने के चक्कर में मांसाहार सेवन को उच्च जीवन शैली और समृद्धि का सूचक मानता हैं। जैसे महंगी गाड़ियां, महंगी होटल में रुकना, ब्रांडेड कपडे, महंगे आईफोन आदि भी आज के युग में जरूरत से ज्यादा अपनी समृद्धि के प्रदर्शन के स्त्रोत मात्र हैं।
क्या मांसाहार का सेवन पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक हैं?
कुछ लोग जो मांसाहारी होते हैं अक्सर कहते हैं कि यदि लोग मांस खाना बंद कर दे तो पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाएगा। यह कथन पूर्णतया अतार्किक है क्योंकि मनुष्य की निर्भरता अपनी आवश्यकता अनुसार निर्मित खाद्य श्रृंखला पर है न कि प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला के ऊपर। जैसे मानव द्वारा पोषित मछली पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन या अन्य पशुपालन जो मांसाहार की आपूर्ति के लिए किये जाते हैं।
क्योंकि लोग मांसाहारी हैं इसलिए पृथ्वी पर मांसाहार उत्पादन की काश्त (कृषि) जाती हैं जैसे मुर्गी पालन, बकरी पालन, मछली पालन। यदि लोग मांसाहार का सेवन नहीं कहेंगे तो मांसाहार की खेती भी नहीं होगी अतः पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
क्या सभी लोग शाकाहारी हो जाए तो खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो जाएगा?
पृथ्वी पर सभी लोगों की खाद्यान्न आपूर्ति के लिए अनाज और वनस्पति पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। अतः सभी लोगों के शाकाहारी होने पर भी कोई खाद्यान्न संकट उत्पन्न नहीं होगा इसके साथ ही एक और प्रश्न क्या दुनिया की भूख मिटाने के लिए मांसाहार आवश्यक हैं? प्रश्न का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
इसे हम इस प्रकार समझते हैं एक मुर्गा न्यूनतम 15 से 20 किलो अनाज खाकर चार लोगों के भोजन के बराबर होता है। इस अनाज से लगभग 60 से 80 लोग भोजन कर सकते हैं।
इसी प्रकार एक बकरा अपने 3 साल के जीवन में लगभग 200-300 किलो शुष्क अनाज के बराबर खाना खाता है इतने अनाज में 1000 लोग आसानी से भोजन कर सकते हैं।
क्या लोग मांस खाना छोड़ दें, तो पर्यावरण प्रदूषण कम हो जाएगा?
इस प्रश्न का जवाब है हॉ। मांसाहार भोजन का उत्पादन शाकाहार भोजन के उत्पादन की तुलना में अधिक पर्यावरण प्रदूषण करता है जैसे- मांस उद्योग के लिए पशुओं को रखने के लिए और उनके प्रबंधन के लिए अधिक ऊर्जा, स्थान और पानी की आवश्यकता होती है।
मांसाहार उत्पादन में शाकाहार की तुलना में अधिक मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है जो एक ग्रीनहाउस गैस हैं।
मछली पकड़ने की आधुनिक विधियो से तटीय और महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्रों को को नुकसान पहुंचता हैं।
मांसाहार उत्पादों के प्रसंस्करण के दौरान केमिकल और खतरनाक रसायनों का उत्सर्जन होता हैं जो जल, वायु और मृदा प्रदूषण के कारक होते हैं।
मांस उत्पादन और जानवरों के जैविक अवशेषों को पर्यावरण में छोड़ देना सड़न, बदबू और गंदगी से वायु प्रदूषण तो होता ही है साथ ही पर्यावरण में कई तरह की बीमारियों के कारण बनते हैं।
क्या मांसाहार लोग शाकाहारियों की अपेक्षा ज्यादा बीमार होते हैं?
इस प्रश्न का जवाब है हॉ। मांसाहारी लोग शाकाहारी लोगों की तुलना में अधिक बीमार होते हैं मांस उत्पादों में अत्यधिक फेट और कैलोरी होती हैं जिससे मोटापा और मधुमेह की संभावना बढ़ती हैं।
एनिमल फैट की अधिकता से शरीर में बेड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड की मात्रा बढ़ती है, जो कि हार्ट अटैक और अन्य दिल की बीमारियों के लिए उत्तरदायी कारक हैं।
खाद्य श्रृंखला के प्राथमिक उपभोक्ताओं और उत्पादकों को दिये जाने वाले रसायन जैसे कीटनाशक पेस्टिसाइड और दर्द निवारक दवाइयां जो पशुओं के शरीर में संचित होती रहती है तथा जिनका जैव अपघटन नहीं होता हैं। ये खतरनाक रसायन मांसाहार करने वाले के शरीर में स्थाई रूप से जमा होकर कैंसर का कारण बनते हैं।
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क्या मांसाहार से व्यक्ति की प्रकृति और बुद्धि में नकारात्मक आती हैं?
सर्वप्रचलित और सर्वविदित कहावत जैसा खाओ अन्न वैसा होवे मन, तो सभी जानते ही हैं। अतः हम जिस तरह का आहार ग्रहण करेंगे हमारी प्रवृत्तियां भी इसी प्रकार की होगी। तीन तरह के आहार का वर्णन धर्म ग्रंथो में मिलता हैं सात्विक, राजसी और तामसिक।
सात्विक आहार से अर्थ है कि भोजन को औषधि के रूप में ग्रहण करना अर्थात शरीर की वृद्धि और अन्य गतिविधियों हेतु आवश्यक ऊर्जा के लिए अनाज, फल, सब्जियां और दूध, दही, छाछ, घी आदि का सेवन करना। इसमें साधारण से साधारण व्यंजनों पर बल दिया गया हैं।
राजसी भोजन में भोजन के स्वाद को प्राथमिकता दी गई है। इसमें कई विशिष्ट प्रकार के व्यंजनों का समावेश होता हैं। इस प्रकार का भोजन शरीर की आवश्यकता नहीं बल्कि इंद्रियों की इच्छा के अनुरुप होता हैं।
तामसी भोजन जो एक राक्षसी प्रवृत्ति हैं इसमें मांस मदिरा आदि का सेवन किया जाता हैं।
सात्विक, राजसिक और तामसी की भोजन करने से क्रमशः सतोगुण रजोगुण और तमोगुण में वृद्धि होती हैं।
तमोगुण मानवीय मूल्यों का विरोधी माना जाता हैं। क्योंकि अगर आप अपने स्वाद के लिए किसी जीव की हत्या करके खा सकते हैं तो इससे आप में निर्दयता आएगी जो की गैर मानवीय मूल्य हैं।
क्या मांसाहार सेवन नैतिक तौर पर उचित है?
मांसाहार सेवन करने वाला हर व्यक्ति एक श्लोक का अंश जरूर जानता है और अक्सर जिक्र भी करता रहता हैं। वह श्लोक का अंश है जीव जीवस्य भोजनम। लेकिन पूरा श्लोक यह है-
अहस्तानि सहस्तानाम अपादानि चतुश्-पदम्।
फाल्गुनी तत्र महताम् जीवो जीवस्य जीवनम् ।।
सर्वप्रथम तो इस श्लोक को जीव जीवस्य जीवनम के स्थान पर जीव जीवस्य भोजनम पढ़कर दुष्प्रचारित किया जाता है।
श्लोक के इस अंश में एक जीव को दूसरे जीव के जीवन का आधार बताया है यह अन्य जीवों के लिए है न की मनुष्य के लिए। क्योंकि प्रकृति में अन्य मांसाहारी जीवों की शारीरिक बनावट ऐसी होती हैं कि वह शाकाहार पर जीवित नहीं रह सकते हैं जबकि मनुष्य के लिए ऐसा नहीं हैं वह शाकाहार मात्र से अपनी शरीर की वृद्धि व विभिन्न गतिविधियों के लिए ऊर्जा का संचय कर सकता हैं।
जीवों के प्रति दया मनुष्य का नैतिक कर्तव्य हैं। इस पर भी कई श्लोक मिलते हैं लेकिन मांसाहार सेवन करने वाले को सिर्फ एक ही श्लोक का अंश और उसका अर्थ कन्ठस्थ होता है जीव जीवस्य भोजनम। वह भी अधूरा होता है पर कुछ अन्य श्लोक निम्न प्रकार हैं-
“दया धर्मस्य जन्मभूमिः ।
इसका अर्थ है कि दया धर्म की जन्मभूमि होती है। अर्थात जिसके अंदर दया और परोपकार जैसे गुण हैं उसे ही हम धार्मिक कह सकते हैं यानी कि धार्मिक होने की सबसे बड़ी पहचान है आपके अंदर दया के गुण उत्पन्न होना।
इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हर धर्म के मूल में ’दया’ की प्रधानता होती है। दया ही सच्चा धर्म है।
’जीवेषु करुणा चापि मैत्री तेषु विधीयताम। इसका अर्थ है, ’जीवों पर करुणा कीजिए और उनके साथ मैत्री कीजिए’।
अहिंसा परमो धर्मः” का मतलब है कि जीवन में अहिंसा सबसे अच्छा धर्म है। इसका मतलब यह हैं कि किसी को भी मन, वचन, या कर्म से दुखी नहीं करना चाहिए।
अतः स्पष्ट हैं कि नैतिक तौर पर हिंसा और मांसाहार सदैव अमानवीय मूल्यों की श्रेणी में आते हैं।
क्या मांसाहार सेवन वैज्ञानिक दृष्टिकोण में उचित है?
प्रकृति में ऊर्जा के एकमात्र स्रोत सूर्य के प्रकाश का प्रथम रूपांतरण शाकाहार है। मांसाहार दूसरे और तीसरे या और उच्च पोषण स्तरों पर प्रचलित होता हैं। कई खतरनाक रसायन और प्रदूषण जो खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं और अजैवनिम्निकारक होते हैं ।
जो रसायन खाद्य श्रृंखला में एक बार प्रवेश करने के बाद स्थाई हो जाता हैं और उसे रसायन की मात्रा उच्च पोषण स्तरों में निरंतर बढ़ती रहती हैं। अतः खाद्य श्रृंखला में कोई भी ऐसा खतरनाक रसायन या प्रदूषण जो खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाता हैं वह मांसाहारी के शरीर में भारी मात्रा में एकत्रित होकर अपना खतरनाक प्रभाव दिखता हैं।
अल्बर्ट आइंस्टीन कहते थे कि शाकाहार का हमारी प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता हैं और यदि दुनिया शाकाहार को अपना ले, तो इंसान का भाग्य पलट सकता है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी लियोनार्डो द विंची तो पिंजरों में कैद पक्षियों को खरीदकर उन्हें उड़ा दिया करते थे। विज्ञान कहता है कि शाकाहार सर्वोत्तम आहार है। जिससे तमाम बीमारियों से बचा जा सकता हैं।
क्या मांसाहार का सेवन धार्मिक दृष्टिकोण में उचित है?
धर्म ग्रंथो में कहीं पर भी मांसाहार का उल्लेख नहीं है।
भगवद्गीता 9.26 में इसकी पुष्टि इस प्रकार की गई है-
पात्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तद अहम् भक्ति-उपहृतं अश्नामि प्रयतात्मनः।।
भगवान कहते हैं यदि कोई मुझे प्रेम और भक्तिपूर्वक एक पत्ता, एक फूल, एक फल या जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार कर लेता हूँ।
धर्म ग्रंथो के अनुसार भोजन को भगवान को भोग लगाकर प्रसाद मानते हुए प्राप्त करना चाहिए। सभी धर्म में जीव दया को प्राथमिकता दी गई हैं एवं हिंसा को गैर मानवीय मूल्य की श्रेणी में रखा गया हैं।
हिन्दू धर्म में सर्वत्र निर्दोषों के प्रति अहिंसा बरतने का ही प्रतिपादन किया गया है और सर्वत्र हिंसा का निषेध। वेदों से लेकर पुराणों तक कहीं पर भी पशु-बलि प्रथा हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है। क्योंकि वेदों में ऐसे सैकड़ो मंत्र और ऋचाएं हैं जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि सनातन धर्म में बलि का कहीं भी कोई उल्लेख नहीं है लेकिन बाद में मानव परंपराएं से प्रभावित होकर अज्ञानतावश धर्म ग्रंथो में इसको मान लिया गया और उनके पुर्नसंस्करण में स्थान देकर इन्हें धर्म ग्रंथो का हिस्सा बना दिया गया।
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च। (ऋग्वेद-10ः87ः16)
अर्थात मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए।
सारांश
वर्तमान मानव की मूल प्रवति शाकाहारी हैं, प्रकृति ने मानव को शाकाहारी बनाया । शाकाहार अपनाने से कई प्रकार की बीमारियों से बचा जा सकता हैं। शाकाहारी होने से हिंसा, जीव हत्या और निर्दयता जैसे अमानवीय मूल्यों से भी बचा जा सकता हैं।
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