पहाड़ की ऊंचाई कैसे नापी जाती हैं?

जब भी हम किसी पर्वत या पहाड़ की बात करते हैं तो सबसे पहले ऊंचाई हमारे दिमाग में आती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की अरावली की परिभाषा से पहाड़ों की ऊंचाई एक चर्चा का विषय बना है। अरावली हो या माउंट एवरेस्ट, पहाड़ का जिक्र होते ही सर्वप्रथम एक ही सवाल आता है कि पहाड़ की ऊंचाई कैसे नापी जाती है? इस पोस्ट में हम पहाड़ की ऊंचाई नापने की विभिन्न विधियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। वैसे तो किसी भी चीज की ऊंचाई नापने के लिए फीते या मेजरिंग टेप का प्रयोग किया जाता है लेकिन पहाड़ की ऊंचाई नापने के लिए यह विधि उपयुक्त नहीं है क्योंकि पहाड़ का एक ढलान होता है जो एक अरेखीय भुजाओं वाले त्रिभुज के आकार जैसा होता है।
पहाड़ की ऊंचाई नापने की विभिन्न विधियां
परंपरागत विधियां
1. समतल त्रिकोणमिति
समकोण त्रिभुज के लिए सामान्य त्रिकोणमिति के नियमों से हम एक भुजा की लंबाई व एक कोण ज्ञात होने पर अन्य भुजाओं की लंबाई और अन्य कोण आसानी से ज्ञात कर सकते हैं।

चित्र में दर्शाए अनुसार AB(ऊंचाई) ज्ञात करने के लिए अगर BC(आधार की लंबाई) और कोण C ज्ञात हो तो त्रिकोणमितीय अनुपात tanC=AB(ऊंचाई)/BC(आधार) से AB= tanC x BC होगा।
त्रिकोणमिति की भाषा में यहां पर AB ऊंचाई है, BC आधार रेखा और AC दृष्टि रेखा तथा C उन्नयन कोण हैं। कोण मापने के विभिन्न उपकरण जैसे प्रोटेक्टर थेओडोलाइट, इंक्लीनोमीटर,सेक्सटेंट आदि की सहायता से कोण C का मान आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।
ये गणना बहुत आसान है लेकिन पहाड़ के संदर्भ में आधार की लंबाई हमें ज्ञात नहीं होती है। इस समस्या के लिए पहाड़ के दोनों तरफ एक ही सरल रेखा पर स्थित दो बिंदुओं से समान उन्नयन कोण निर्धारित करके दोनों बिंदुओं की के बीच की दूरी को अन्य विधियों से ज्ञात करके आधार रेखा की लंबाई ज्ञात की जा सकती हैं। लेकिन इस विधि से भी कम ऊंचाई के पहाड़ों की ऊंचाई ज्ञात कर सकते हैं। अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ों के आधार बिंदु का यथार्थता से आकलन करना बहुत मुश्किल होता है।
त्रिकोणमिति से बड़े पहाड़ों की ऊंचाई ज्ञात करने में निम्नलिखित समस्या आती है।
- आधार बिंदु का निर्धारण अर्थात अवलोकन बिंदु से आधार बिंदु की दूरी ज्ञात करना मुश्किल होता है।
- अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ों के शीर्ष अत्यधिक ऊंचे और दूर होने से दृश्यता कम होने के कारण शीर्ष बिंदु का आकलन करना भी मुश्किल होता है।
- अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ों के शीर्ष को अवलोकन बिंदु से मिलाने वाली दृष्टि रेखा विभिन्न वायुमंडलीय दबाव वाली परतों से गुजरती है जिससे अपवर्तन का प्रभाव शामिल हो जाता है तथा यह वास्तविक मान को प्रभावित करता है।
2. अल्टीमीटर
अल्टीमीटर ऊंचाई नापने का एक यंत्र है यह किसी स्थान की ऊंचाई को समुद्र तल से नापता है। ऊंचाई के साथ-साथ वायुमंडलीय दबाव में कमी आती है। संदर्भ बिंदु के वायुदाब को समुद्र तल पर वायुदाब के अंतर के आधार पर यह यंत्र किसी बिंदु की ऊंचाई का निर्धारण करता है।
यह विधि भी यथार्थता से ऊंचाई का मापन नहीं कर सकती क्योंकि ऊंचाई के साथ वायुदाब में परिवर्तन अरेखीय हो सकता है।
3. उच्च परिशुद्धता समतलन विधि
तट रेखा से शुरू करके विभिन्न मापन उपकरणों से ऊंचाई में अंतर की गणना करते हुए पहाड़ की चोटी तक की ऊंचाई मापी जाती है। इस विधि से सटीक ऊंचाई तो ज्ञात की जा सकती है लेकिन यह बहुत ही लंबी और अव्यावहारिक प्रक्रिया हो सकती है।
यह विधि तब अव्यावहारिक होती है जब पहाड़ की चोटी पर चढ़ना संभव नहीं हो।
पहाड़ की ऊंचाई ज्ञात करने के उक्त तीन विधियां पारंपरिक है वर्तमान में इन विधियों का उपयोग प्रासंगिक नहीं है।
आधुनिक विधियां
पहाड़ की ऊंचाई नापने के लिए आधुनिक विधियों में जीपीएस, LiDAR और फोटोगेमेट्री तकनीक का प्रयोग किया जाता हैं।
1. GPS तकनीक
इस तकनीक से हम सभी भली भांति परिचित है, GPS सेटेलाइट की मदद से पृथ्वी पर किसी बिंदु की स्थिति और ऊंचाई का पता उच्च यथार्थता के साथ लगाया जा सकता है।
जीपीएस सैटेलाइट पृथ्वी के मध्यम कक्षा में स्थापित होते हैं। जीपीएस के लिए 24 सेटेलाइट का एक समूह होता है जो 12 घंटे में पृथ्वी का चक्कर पूरा करते हैं। पृथ्वी पर किसी स्थान या बिंदु की स्थिति पता करने के लिए कम से कम चार सैटेलाइट से दूरी की गणना कर वास्तविक स्थिति और ऊंचाई का पता लगाया जाता हैं।
2. LiDAR टेक्नोलॉजी
लाइडार की फुलफॉर्म लाइट डिटेक्शन एंड रेजिंग हैं।
इस तकनीक में भूभाग पर विमान द्वारा प्रकाश की किरणें छोड़ी जाती है जो भू भाग से परावर्तित होकर रिसीवर तक पहुंचती है। GIS तकनीक का प्रयोग करके भूभाग का डिजिटल मानचित्र तैयार किया जाता है। यह तकनीक सेंटीमीटर तक की यथार्थता के साथ मापन कर सकती है।
फोटोगेमैट्री
यह तकनीक भी विमान द्वारा विभिन्न स्थितियों एवं एंगल के साथ फोटोग्राफी करके भूभाग का एक मॉडल तैयार करती है जिसकी सहायता से किसी पहाड़ की ऊंचाई का आकलन किया जाता है।
हाल ही में पहाड़ों की ऊंचाई पर हुए विवाद
अरावली विवाद
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में आदेश दिया कि 100 मीटर से ऊपर की पहाड़ियां ही अरावली की श्रेणी में आएगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बहस शुरू हो गई। क्योंकि लगभग 90% अरावली की पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की है जो अब खनन के लिए अनुमत होगी और संरक्षण से बाहर हो जाएगी। हालांकि आम लोगों और पर्यावरणविदों के आक्रोश पर संज्ञान लेते हुए एक महीने के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले को स्थगित कर रिव्यू करने का फैसला किया है।
यहां पर बहस का विषय यह था कि 100 मीटर वाला फार्मूला कहां से आया है? इस प्रश्न का जवाब है अमेरिकी भूगोलवेत्ता रिचर्ड ई मर्फी ने 1968 में मानचित्र पर भू आकृतियों को दर्शाने के लिए भू आकृतियों का वर्गीकरण किया था। जिसमें पर्वत, पहाड़, पठार और मैदानों को मानचित्र पर दर्शाने के लिए मानदंड निर्धारित किए गए थे जो विश्व भर में सर्वाधिक स्वीकृत और प्रचलित मानदंड माने जाते हैं।
वैसे देखा जाए तो 100 मीटर का आंकड़ा वैज्ञानिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक है, क्योंकि अध्ययन के लिए भूभाग की संरचना में अंतर करने के लिए ऊंचाई का कोई तो पैमाना चाहिए था तो एक सामान्य मनोवैज्ञानिक आंकड़ा 100 मीटर निश्चित कर लिया गया।
माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई पर विवाद
वर्ष 2020 में चीन और नेपाल ने संयुक्त रूप से माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई अत्याधुनिक तकनीक से नाप कर बताया कि विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8848.86 मीटर है। जिसे विश्व भर में स्वीकार किया गया। भारत के सर्वे आफ इंडिया एजेंसी ने माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 1954 में परंपरागत तकनीक त्रिकोणमिति, थोडोलाइट आदि उपकरणों की सहायता से नापी थी जो 8848 मीटर थी। जो कि वर्तमान ऊंचाई से 86 सेंटीमीटर कम है। यही विवाद का विषय है। इस पर कुछ भू वैज्ञानिकों का कहना है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई लगातार बढ़ रही है जबकि कुछ लोगों का मानना है कि यह अंतर मापन में यथार्थता की कमी के कारण हैं।
यहां पर दोनों तर्क स्वीकार्य है।
- क्योंकि इतने विशाल और दुर्गम भूभाग की ऊंचाई यथार्थता के साथ मापन बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। उस समय सैटेलाइट तकनीक विकसित नहीं हुई थी।
- टेक्टोनिक प्लेट सिद्धांत के अनुसार भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर से टेथीज सागर के तलछटों के उन्नयन से वलित पर्वतमाला हिमालय का निर्माण हुआ था। इन प्लेटों में गति अभी भी जारी है। भारतीय प्लेट लगभग 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से उत्तर दिशा में खिसक रही हैं। इस सिद्धांत के अनुसार हिमालय पर्वत का निर्माण अभी भी जारी है और ऊंचाई बढ़ना सामान्य बात हो सकती हैं।
पहाड़ों की ऊँचाई में अंतर क्यों आता हैं?
पहाड़ों की ऊंचाई में अंतर आना आम बात है क्योंकि ऊंची पर्वत चोटियों पर जमी बर्फ की मोटाई बदलती रहती है। जलवायु परिवर्तन के कारण भी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। यधपि पर्वत चोटी की ऊंचाई में बर्फ की मोटाई को शामिल करना या नही करना भी विवाद का विषय हैं। भूकंप और ज्वालामुखी से भी पर्वतों की ऊंचाई परिवर्तित हो सकती है। ऊंचे पहाड़ों पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अत्यधिक होने के कारण निरंतर भूस्खलन होता रहता है। भूस्खलन और बर्फ का पिघलना दोनों कारणों से किसी भी पहाड़ की ऊंचाई निरंतर कम होनी चाहिए। वहीं इसके विरुद्ध टेक्टोनिक प्लेट सिद्धांत और महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के भौगोलिक स्वरूप में परिवर्तन निरंतर जारी है, तर्क है जो पहाड़ों की ऊंचाई बढ़ने को स्वीकार करता है।
भू आकृतियों की ऊंचाई नापने का आधार
पृथ्वी पर सभी भू आकृतियों की ऊंचाई की गणना समुद्र तल से की जाती है। क्योंकि पृथ्वी पर समुद्र का जलस्तर ही एकमात्र आधार है जो एक काल्पनिक समतल हैं। हालांकि पृथ्वी की घूर्णन गति और पृथ्वी की आंतरिक संरचना में भिन्नता के कारण गुरुत्वाकर्षण का मान अलग-अलग स्थानों पर अलग होने से समुद्र जल स्तर में भी भिन्नता हो सकती हैं।
जैसे पृथ्वी की घूर्णन गति के परिणाम स्वरूप अपकेंद्रीय बल के प्रभाव से ध्रुवों पर गुरुत्वाकर्षण का मान अधिकतम और विषुवत रेखा पर न्यूनतम होता है। अतः समुद्र का जलस्तर विश्वत रेखा की तुलना में ध्रुवों पर कम होगा। समुद्र तल से ऊंचाई कैसे नापी जाती है इसके लिए हमारा विस्तृत आर्टिकल पढ़ें।
पहाड़ और पर्वत में क्या अंतर है?
इसका कोई स्पष्ट वैज्ञानिक पैमाना नहीं है लेकिन आमतौर पर समुद्र तल से 600(लगभग 2000 फिट) मीटर से अधिक ऊंचाई वाले भूभाग जिनका शीर्ष आधार की तुलना में अत्यधिक सँकरा है या तीव्र ढलान है या चोटीनुमा संरचना बनाते हैं, को पर्वत कहा जाता है। समुद्र तल से 600 मी से कम ऊंचाई वाले भूभाग जिनका शीर्ष आधार की तुलना में सँकरा है और ढलान वाली सरंचना बनाते हैं, पहाड़ कहलाते हैं। पहाड़ी, पहाड़ और पर्वत का वर्गीकरण वैज्ञानिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक है।
पठार
ऐसा भूभाग जो आसपास के क्षेत्र से ऊपर उठा हुआ हो और जिसका शीर्ष समतल तथा शीर्ष की चौड़ाई आधार की चौड़ाई के लगभग समान हो पठार कहलाता है। पत्थर आसपास के क्षेत्र से ऊपर उठा होता है तथा ऊंचाई की कोई ऊपरी सीमा नहीं है।
पृथ्वी पर अधिकतम कितने ऊंचे पहाड़ हो सकते हैं? क्या इसकी कोई सीमा है?
इसका कोई आधिकारिक जवाब तो नहीं है लेकिन भू वैज्ञानिकों का मानना है 10 से 15 किलोमीटर की ऊंचाई बाद चट्टाने अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से लुढ़कने लगेगी और पृथ्वी पर इससे अधिक ऊंचे पहाड़ होना असम्भव हैं।
पर्वत चोटियों के निर्धारण में विवाद
विश्व की 100 से अधिक शीर्ष ऊंची पर्वत चोटियां हिमालय में स्थित है। जिनमें से अधिकांश काराकोरम श्रेणी में है।
यहां पर एक विवाद का विषय है कि एक ही पर्वत श्रृंखला पर दो अलग पर्वत चोटियों के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए तभी उनको अलग अलग पर्वत चोटी माना जायेगा। यह स्पष्ट नहीं है।
पृथ्वी के महाद्वीपों पर स्थित ऊंची पर्वत चोटियां नीचे दी गयी हैं।
- एशिया माउंट एवरेस्ट 8848.86 मीटर
- दक्षिणी अमेरिका माउंट एकांगगुआ 6962 मीटर
- उत्तरी अमेरिका माउंट डेनाली 6190 मीटर
- अफ्रीका माउंट किलिमंजारो 5895 मीटर
- यूरोप माउंट एलब्रस 5642 मीटर
- अंटार्कटिका माउंट विंसन 4892 मीटर
- ऑस्ट्रेलिया माउंट कोसियसजको 2228 मीटर।
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