क्या पर्यावरण का दुश्मन है कॉनोकॉर्पस इरेक्टस?

क्या पर्यावरण का दुश्मन है कॉनोकॉर्पस इरेक्टस?

कॉनोकॉर्पस इरेक्टस
कॉनोकॉर्पस इरेक्टस

कॉनोकॉर्पस- शहरों में सड़कों की डिवाइडर पर या होटलों, पार्कों, मैरिज गार्डन आदि में यह हराभरा पेड़ तो आपने देखा ही होगा। हमेशा हरा भरा रहने वाला और सुंदर सा दिखने वाला यह पौधा पर्यावरण की दृष्टिकोण में विवाद का विषय है। कई पर्यावरणविद इसे पर्यावरण के लिए घातक पौधा मानते हैं। जी हाँ हम बात कर रहे हैं कॉनोकॉर्पस पौधे के बारे में। 

कई शहरी निकायों में यह पेड़ बड़े पैमाने पर लगाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कहीं शहरी निकायों में यही पेड़ बड़े स्तर पर हटाया जा रहा है।

इस पोस्ट में हम कोनोकोर्पस पौधे के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे और समझेंगे कि क्यों यह पेड़ विवादित है? और यह पर्यावरण के लिए कैसे हानिकारक है? हमें अपने घरों यह कार्य स्थलों के आसपास यह पौधा लगाना चाहिए अथवा नहीं?

कॉनोकॉर्पस पौधे के बारे में सामान्य जानकारी

कॉनोकॉर्पस उष्णकटिबंधीय अमेरिकी और पश्चिमी अफ्रीका के समुद्र तटीय मूल की एक मैंग्रोव प्रजाति का पेड़ हैं। मैंग्रोव समुद्र किनारों, डेल्टा, लवणीय और दलदली भूमि पर उगने वाली एक प्रकार की झाड़ीनुमा वनस्पति होती हैं। 

कॉनोकॉर्पस एक तेजी से वृद्धि करने वाला तथा हमेशा हराभरा रहने वाला व्यापक जलवायु परिस्थितियों में अनुकूल पौधा हैं। इसकी आकर्षक और सजावटी बनावट तथा न के बराबर देखभाल और सुरक्षा उपाय के कारण यह काफी लोकप्रिय पौधा है। इसी कारण पिछले दो दशकों में है यह पौधा पूरे भारत के लगभग सभी शहरों में बड़ी संख्या में लगाया गया हैं।

वैज्ञानिक वर्गीकरण में कॉम्ब्रेटेसी कुल का पेड़ हैं। इसका वैज्ञानिक नाम कॉनोकॉर्पस इरेक्टस हैं। इसे कॉनोकॉर्पस या बटनवुड सामान्य नाम से जाना जाता हैं। भारतीय दृष्टिकोण में यह एक विदेशी प्रजाति है। 

कोनोकॉर्पस के हानिकारक प्रभाव

  1. मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा– इसके परागण (pollens) हवा में घुलकर अस्थमा व अन्य श्वास संबंधी बीमारियां उत्पन्न करते हैं।  इस पेड़ के सीधे संपर्क में आने से आंखों में जलन में त्वचा संबंधी बीमारियां एलर्जी आदि हो सकती है।
  2. भूजल व अन्य पोषक तत्वों का तीव्रता से दोहन– क्योंकि यह पौधा हमेशा हरा भरा रहता है इस कारण अत्यधिक मात्रा में वाष्पोत्सर्जन कर भूजल का तेजी से दोहन करता है जिससे भूजल स्तर तेजी से गिरता है। साथ ही यह पौधा जमीन से विभिन्न पोषक तत्वों का भी तीव्रता के साथ अवशोषण करता है जिससे कुछ समय बाद वह जमीन उसर या अनुपजाऊ बन जाती है।
  3. स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्रों और जैव विविधता को खतरा- भूजल और पोषक तत्वों के तेजी से विदोहन के कारण स्थानीय प्रजातियों इसके साथ प्रतिस्पर्धा नही कर पाती है और जल और पोषक तत्वों के अभाव में नष्ट हो जाती है।
  4. पक्षियों और अन्य जीव जगत के लिए अनुपयोगी- इस पेड़ के किसी भी भाग को मवेशी या अन्य शाकाहारी जीव नहीं खाते हैं। इसके फल और बीजों को भी पक्षी नहीं खाते हैं। सामान्यत: यह देखा गया है कि चिड़िया या अन्य पक्षी इस पेड़ पर अपना घोंसला नहीं बनाते हैं।

भारत में लोग कोनोकॉरपस पेड़ क्यों लगा रहे हैं?

विवादित होने के बावजूद कोनो कॉरपस पेड़ पूरे भारत में लगभग सभी शहरों में देखने को मिल जाता है। इस पेड़ के इतना लोकप्रिय होने के पीछे निम्नलिखित कारण है-

  1. यह पौधा अन्य पौधों की तुलना में तेजी से वृद्धि करता है।
  2. विषम परिस्थितियों जैसे सूखा, अतिवृष्टि, पाला, कोहरा आदि से अप्रभावित रहता है।
  3. यह एक सदाबहार पेड़ है जो वर्ष पर्यंत हरा रहता है।
  4. इसकी बनावट सुंदर और आकर्षक होती है। इसका क्राउन एक समान सघन और शंकु नुमा होता है। जिससे यह शहर और सड़कों की की सुंदरता को बढ़ता है।
  5. यह पेड़ ग्रीन वॉल के रूप में काम करता है। जो सड़कों के किनारे ध्वनि, वायु और प्रकाश प्रदूषण के अवरोध के रूप में काम करता है। होटलों, पार्कों आदि में रोड़ साइड में ग्रीन हेज वॉल के रूप में प्राकृतिक अवरोध के लिए इसे लगाया जाता है।
  6. इस पेड़ को मवेशी नहीं खाते हैं जिससे इसकी सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध और खर्च की आवश्यकता नहीं होती है।
  7. इस पेड़ का जीवितता प्रतिशत (survival percentage) अन्य प्रजातियों की तुलना में उच्च होता हैं। 
  8. जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति जैसे कार्बन तटस्थता आदि लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नीतिगत दबाव में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा न्यूनतम संधारण की आवश्यकता और उच्च जीवितता प्रतिशत के कारण पौधारोपण हेतु इस पौधे का चयन किया जा रहा है।
  9. इसके हानिकारक प्रभावों के बारे में आम जन में जागरूकता का अभाव होने के कारण भी इस पेड़ को लगाने का प्रचलन लगातार बना हुआ है।

कोनो कॉरपस पेड़ पर सरकार का दृष्टिकोण

इस पेड़ के हानिकारक प्रभावों के कारण कई राज्यों में इस पेड़ को प्रतिबंधित कर दिया गया है। कोनोकार्पस पेड़ लगाने पर प्रतिबंध लगाने वाला प्रथम राज्य गुजरात है जिसने सितंबर 2023 में इस पेड़ के लगाने पर प्रतिबंध लगाया था।

कोनो कॉरपस पेड़ लगाने को प्रतिबंधित करने वाले राज्य

  1. गुजरात
  2. आंध्र प्रदेश
  3. तमिलनाडु
  4. मध्य प्रदेश
  5. छत्तीसगढ़
  6. गोवा

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्राधिकृत केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति सीईसी(CEC) ने कोनोकॉरपस प्रजाति के पेड़ लगाने पर प्रतिबंध की मांग की है। 

कॉनोकॉर्पस पेड़ के पक्ष में तर्क

  1. कुछ पर्यावरणविदों का मानना है की प्रकृति में जो भी वनस्पतियां है उसका किसी ने किसी रूप में पर्यावरण के हित में अपना महत्व होता है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन को रोकना सबसे अहम वैश्विक मुद्दा है। इसके लिए बड़े स्तर पर वृक्षारोपण किए जा रहे हैं लेकिन इन कृत्रिम वृक्षारोपण की सफलता बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में कोनोकॉरपस पेड़ प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहकर कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करता रहता है और जलवायु परिवर्तन को रोकने में अपना योगदान देता है। जो पेड़ जितनी तेजी से वृद्धि करता है उतनी ही अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करता है। क्योंकि पेड़ द्वारा अर्जित शुष्क जैवभार CO2 अवशोषण का ही प्रतिफल होता हैं।
  2. संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत आदि मरुस्थलीय और वनरहित देशों में लगभग 70% हरित आवरण कोनोकॉर्पस के कारण ही है। अगर वहां पर इस पेड़ को नहीं लगाया जाए तो वहां का हरित आवरण शून्य हो जाएगा क्योंकि वहां की प्रतिकूल परिस्थितियों में अन्य प्रजातियां सरवाइव नहीं कर पाती है। 
  3. विदेशी प्रजाति होने के कारण हमारे देश भारत में कॉनोकॉर्पस का मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध उत्पन्न होता है। इस कारण भी विवाद बढ़ जाता है। लेकिन मात्र विदेशी होने से हम किसी वनस्पति प्रजाति का विरोध नहीं कर सकते हैं। जैसे अगर विदेशी प्रजातियों की अगर हम बात करें तो आलू, टमाटर, चाय, कॉफी, गेहूं, मिर्च आदि भी भारतीय मूल की प्रजातियां नहीं है। तो क्या हम इनका भी विरोध करेंगे?
  4. इसकी जड़ों के कारण अवसंरचनाओं जैसे अंडरग्राउंड पाइप लाइनों, संचार लाइनों, नालियों आदि को क्षति पर भी चिंता व्यक्त की जाती हैं। लेकिन इसके लिए अकेला कोनोकॉरपस पेड़ जिम्मेदार नहीं है किसी भी पेड़ की जड़ें इस प्रकार अवसंरचना को नुकसान पहुंचा सकती है।
  5. कोनो कॉरपस पेड़ के जितने भी नुकसान बताए जाते हैं सभी पर भारतीय परिस्थितियों में अभी तक व्यापक रिसर्च का अभाव है। अतः अधूरे ज्ञान के कारण इस पेड़ को हटा कर हम प्रकृति का बड़ा नुकसान भी कर सकते हैं।

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निष्कर्ष

कॉनोकॉर्पस को हर परिस्थिति में पर्यावरण के लिए हानिकारक घोषित करने के बजाय, इसके रोपण के स्थान, पैमाने और स्थानीय पारिस्थितिक प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना अधिक उचित है।

इसके परागकणों से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और जड़ों से बुनियादी ढाँचे को संभावित नुकसान के पक्ष में प्रमाण उपलब्ध हैं। इसकी अनुकूलन क्षमता भी शोधों में प्रदर्शित हुई है। लेकिन भारत में भूजल स्तर गिराने, पक्षियों की संख्या घटाने या व्यापक स्तर पर देशी वनस्पतियों को समाप्त करने के दावों को निर्णायक रूप से सिद्ध करने के लिए और अधिक स्थानीय क्षेत्रीय शोध की जरूरत है।

सौंदर्यकरण के लिए बड़ी संख्या में अन्य वनस्पति के विकल्प मौजूद होते होते हुए विवादित कॉनोकॉर्पस पौधे को लगाने से बचना चाहिए।

हमें कोनोकॉर्पस के स्वास्थ्य दुष्प्रभाव के बारे में आमजन में जागरूकता फैलानी चाहिए। हमें इस पेड़ के सीधे संपर्क में आने से बचना चाहिए।