अल नीनो क्या है? यह मानसून को कैसे प्रभावित करता हैं?
आधा जुलाई बीत जाने के बाद भी लगभग पूरे भारत में मानसून कमजोर ही बना हुआ है। जैसा कि मौसम विशेषज्ञों का पूर्वानुमान था कि इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव से मानसून कमजोर रहेगा। समाचार पत्रों, न्यूज़ चैनल सोशल मीडिया पर हर जगह यही खबर देखने को मिल रही है कि अल नीनो के प्रभाव से बारिश नहीं हो रही है।
अल नीनो पूरे विश्व के मानसून पैटर्न को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। अल नीनो भारतीय मानसून के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। भारतीय कृषि मानसून आधारित है इसलिए भारतीय कृषि को मानसून का जुआ भी कहते हैं।
इस पोस्ट में हम विस्तार से समझते हैं हैं कि अलनीनो क्या है? यह मानसून को कैसे प्रभावित करता है?
अल नीनो का शाब्दिक अर्थ
अल नीनो मौसम विज्ञान में प्रचलित शब्द हैं। इसका शाब्दिक अर्थ छोटा बच्चा या ईसा मसीह का बाल रूप होता है। वैसे अल नीनो के शाब्दिक अर्थ का मानसून से कोई लेना-देना नहीं है। प्रशांत महासागर में अल नीनो की घटना लगभग नवंबर या दिसंबर क्रिसमस डे के आसपास बनती है इस कारण मछुआरों ने इसे ईसा मसीह से जुड़ा हुआ अल नीनो नाम दे दिया।
अल नीनो
अल नीनो को समझने से पहले थोड़ा विश्व मानचित्र और व्यापारिक पवनों को समझते हैं।
विश्व मानचित्र
विश्व मानचित्र का नाम लेते ही हमारे दिमाग में यह छवि बनती है।

लेकिन अल नीनो को समझने के लिए यह छवि पर्याप्त नहीं है। इस सामान्य मानचित्र में पूर्व में भी प्रशांत महासागर और पश्चिम में भी प्रशांत महासागर होता है इसका तात्पर्य यह है कि पृथ्वी गोल है लेकिन इसको अध्ययन के लिए सरलता के लिए एक जगह से काटते हुए आयताकार दर्शाया जाता है। विश्व मानचित्र को प्रशांत महासागर के मध्य से इसलिए काटा गया क्योंकि इस लंबवत रेखा पर लगभग कोई देश या भूभाग स्थित नहीं है।
अल नीनो को समझने के लिए ग्लोब के दूसरी साइड से देखना होगा और यह मानचित्र बनता हैं। जिसमे पूरा प्रशांत महासागर एक साथ दिखाई देता हो। क्योंकि अल नीनो प्रशांत महासागर की घटना है।

व्यापारिक पवने
अल नीनो का मुख्य कारण व्यापारिक पवनों के कारण प्रशांत महासागर के सतही जल का विस्थापित होना है। इसके लिए व्यापारिक पवनों को समझने की भी आवश्यकता है।

व्यापारिक पवनें भूमध्य रेखा के लगभग समानांतर पूर्व से पश्चिम की तरफ चलती है। इनकी दिशा पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन की दिशा पश्चिम से पूर्व की ओर से विपरीत अर्थात पूर्व से पश्चिम की ओर (कोरियोलिस प्रभाव के कारण) होती है।
यह बिल्कुल वैसा है जैसा कि हम किसी पानी से भरी बाल्टी में केंद्र से थोड़ा बाहर पानी पर एक तैरता हुआ तिनका छोड़ दें, और बाल्टी को उठाकर बिना हिलाए इसके अक्ष पर घुमाते हैं तो पानी पर तैरता हुआ तिनका विपरीत दिशा में घूमता हुआ प्रतीत होता है।
क्योंकि इन पवनों की दिशा वर्ष भर निश्चित होती है इस कारण प्राचीन काल में इन पवनों का उपयोग समुद्र में दिशा की जानकारी के लिए किया जाता था। पाल वाली नावों के युग में (लगभग 15वीं से 16वीं शताब्दी) व्यापार करने के लिए मालवाहक नावों के संचालन में इन हवाओं का इस्तेमाल किया जाता था। इस कारण इन हवाओं का नाम व्यापारिक पवन पड़ा।
प्रशांत महासागर में मानसून की सामान्य स्थिति
सामान्य स्थिति में प्रशांत महासागर का ऊपरी जल सूर्य से ऊष्मा प्राप्त कर गर्म होता है और व्यापारिक पवनों द्वारा पश्चिम दिशा में धकेला जाता है। इससे यह गर्म जल ऑस्ट्रेलिया के आसपास पश्चिमी प्रशांत महासागर और हिंद महासागर तक पहुंचता है यहां समुद्र के जल का बढ़ा हुआ तापमान मानसून उत्पन्न करता है। जिससे ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्वी एशिया में अच्छी बारिश होती है। क्योंकि मानसून उत्पन्न होने के लिए समुद्र में उच्च तापमान लगभग 27 से 30 डिग्री सेल्सियस होना आवश्यक है।

इस सामान्य स्थिति में पूर्वी प्रशांत महासागर में दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट के आसपास का सतही गर्म जल पश्चिम की तरफ विस्थापित होता है। इसे प्रतिस्थापित करने के लिए समुद्र के नीचे से ठंडा जल ऊपर आता है। इस घटना को अपवेलिंग कहते हैं। यह ठंडा जल समुद्र के पेंदे से अपने साथ बहुत सारे पोषक तत्वों को लाता है। जिससे यहां मछलियों का अच्छा विकास होता है। इस कारण पेरू और इक्वाडोर में मत्स्य उद्योग चरम पर होता है।
अल नीनो की स्थिति
अल नीनो की स्थिति में व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती है या विपरीत दिशा में चलती हैं। जिससे प्रशांत महासागर का सतही जल व्यापारिक पवनों द्वारा पूर्वी दिशा में धकेला जाता हैं जो दक्षिणी अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर के पश्चिमी तटों के आसपास जमा होता है। इस कारण दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट के आसपास पूर्वी प्रशांत महासागर में उच्च तापमान स्थापित हो जाता है। यह उच्च तापमान मानसून उतपन्न करता है जो दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों पर भारी वर्षा करता है।

इसी के साथ ही पश्चिमी प्रशांत महासागर (ऑस्ट्रेलिया के आसपास) और हिंद महासागर के सतह का गर्म जल जल पूर्व दिशा में विस्थापित होने से इसे प्रतिस्थापित करने के लिए समुद्र की गहराई का ठंडा जल ऊपर आ जाता है (अपवेलिंग)। इस कारण पश्चिमी प्रशांत महासागर और हिंद महासागर में निम्न तापमान स्थापित होता है। यह निम्न तापमान मानसून बनने में बाधक होता है। इस कारण ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी पूर्वी एशिया में सूखे की स्थिति बनती है।
सुपर अल नीनो
अल नीनो की स्थिति में भूमध्य रेखा के पास पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 1 से 2 डिग्री बढ़ जाता है। तापमान में यह वृद्धि भले ही कम लगे लेकिन पूरी पृथ्वी के मानसून पैटर्न को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है। तापमान में यह वृद्धि 2 डिग्री से अधिक होने सुपर एल नीनो कहा जाता है।
क्या अल नीनो प्राकृतिक घटना है?
हां, अल नीनो एक पूर्णतः प्राकृतिक घटना है जो सदियों से पृथ्वी पर होती आ रही है। यह मानव जनित जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो के दुष्प्रभाव और भयानक होते जा रहे हैं।
अल नीनो समय चक्र
अल नीनो घटना के चक्र का कोई निश्चित समय नहीं है लेकिन 2 से 7 साल में पुनरावृत्ति होती हैं।
जबकि सुपर अल नीनो 10 से 15 साल में घटित होता है।
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अल नीनो के प्रभाव
1. दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों पर भारी बारिश और बाढ़ व भूस्खलन की स्थिति बनती है। इस अतिवृष्टि से फसले नष्ट होती है साथ ही व्यापारिक गतिविधियां भी अवरुद्ध होती है।
2. ऑस्ट्रेलिया इंडोनेशिया और भारत में सामान्य से कम वर्षा या सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। परिणाम स्वरूप इन देशों में कम कृषि उत्पादन से खाद्यान्न संकट उत्पन्न होता है। कृषि आधारित उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
3. पेरू और इक्वाडोर के तट पर सामान्य स्थिति में अपवेलिंग की घटना से मत्स्य उद्योग चरम पर होता है। अल नीनो की स्थिति में अपवेलिंग की घटना नहीं होने से यहां का मत्स्य उद्योग बुरी तरह प्रभावित होता है।
4. ऑस्ट्रेलिया में जंगलों की आग की घटनाएं काफी बढ़ जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर अल नीनो का प्रभाव
भारत में कृषि आज भी मानसून पर निर्भर होती है। इसलिए हम भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहते हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। अल नीनो की स्थिति में खाद्यान्न और कृषि आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन पर्याप्त नहीं होता है। इस कारण अल नीनो की स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।
ला नीनो
ला नीनो, अल नीनो के विपरीत और सामान्य स्थिति का बड़ा रूप है। जैसा हमने सामान्य स्थिति में पढ़ा की प्रशांत महासागर में हवाएं पूर्व से पश्चिम की तरफ चलकर गर्म पानी को ऑस्ट्रेलिया और एशिया की तरफ धकेलती है। ला नीनो में इन पवनों की गति अत्यधिक बढ़ जाती है जिससे पश्चिमी प्रशांत महासागर ऑस्ट्रेलिया के आसपास और हिंद महासागर में तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है। इस कारण ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्व एशिया में मानसून सामान्य की तुलना में ज्यादा सक्रिय होता है और यहां पर भारी बारिश होती है।
वहीं दूसरी ओर दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों के आसपास प्रशांत महासागर का पानी ठंडा होता है। इससे वहां पर मानसून उत्पन्न नहीं होता है और दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों पर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।



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