विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस युग में मानव तकनीकी का प्रयोग कर अपने अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करने में काफी हद तक सफल रहा है। इनमें से एक है कृत्रिम वर्षा। वर्तमान में हर वर्ष कहीं ना कहीं कम वर्षा वाले स्थान पर कृत्रिम बारिश करना चर्चाओं में रहता है।

तकनीकी और कुछ विशेष रसायनों का प्रयोग करते हुए बादलों में वर्षा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करके वर्षा को प्रेरित करना कृत्रिम वर्षा कहलाता है। इसे क्लाउड सीडिंग अथवा मेघ बीजन भी कहते हैं। इस पोस्ट में हम विस्तार से जानेंगे कि कृत्रिम वर्षा, कृत्रिम वर्षा की प्रक्रिया, सीमाएं और चुनौतियां क्या है?

कृत्रिम वर्षा क्या होती है?

बादलों में कुछ विशेष रसायनों का छिड़काव कर मौसम में अल्पकालिक परिवर्तन कर बारिश का प्रयास किया जाता है। इस प्रक्रिया को क्लाउड सीडिंग अथवा मेघ बीजन कहते हैं। इसमें बादलों में उपस्थित नमी को पानी की बूंद में परिवर्तित किया जाता है जिससे बूंदे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से जमीन पर गिरती हैं। कृत्रिम वर्षा के लिए आवश्यक हैं कि बादलों में पर्याप्त नमी मौजूद हो। कृत्रिम वर्षा को अच्छे से समझने के लिए हम पहले समझते हैं कि प्राकृतिक रूप से बारिश कैसे होती हैं?

बारिश कैसे होती हैं?

पृथ्वी की सतह पर उपस्थित जल सूर्य के प्रकाश से ऊष्मा प्राप्त कर जलवाष्प में बदलता है। जलवाष्प पानी का ही गैसीय रूप है। जलवाष्प गैस जो कि हल्की होने के कारण गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर उठती हैं। भारी मात्रा में जलवाष्प के एकत्रित होने के कारण बादल बनते हैं।

हवा में जलवाष्प धूल के कणों, प्रदूषकों, परागकणों और बर्फ के क्रिस्टलों की सतह पर अत्यधिक कम तापमान होने के कारण जमकर पानी की बूंद का निर्माण करती है। जलवाष्प का पानी की बूंद में परिवर्तित होना संघनन कहलाता है। ये बूंदे भारी होने के कारण गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से जमीन पर गिरती है जिसे हम वर्षा का होना कहते हैं।

क्षोभमंडल मे ऊंचाई के साथ तापमान में गिरावट होती हैं ऊंचाई के साथ तापमान में गिरावट की दर को लेप्स रेट कहते हैं। यह सामान्यतया 6.5 डिग्री सेल्सियस प्रति किलोमीटर होती है। इसके अनुसार लगभग 6 से 7 किलोमीटर की ऊंचाई पर तापमान लगभग शून्य होता है।
वर्षा का पानी पृथ्वी की सतह से या तो सीधा वाष्पीकृत हो जाता है या फिर नदियों, नालों से बहता हुआ समुद्र में पहुंचता हैं। वहां से पुनः वाष्पीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। इस पूरे चक्र को हम जल चक्र कहते हैं।

बारिश को कैसे नापा जाता हैं? विस्तृत आर्टिकल पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

कृत्रिम वर्षा की प्रक्रिया

कृत्रिम वर्षा
कृत्रिम वर्षा कैसे होती है?

कृत्रिम वर्षा के लिए सबसे पहले बादलों में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। बिना नमी की स्थिति में कृत्रिम वर्षा असंभव है। कृत्रिम वर्षा के लिए नमी युक्त बादलों में कुछ विशिष्ट रसायनों सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड, ठोस CO2 या शुष्क बर्फ का छिड़काव किया जाता है। यह छिड़काव वायुयान या आधुनिक ड्रोन उपकरणों की मदद से किया जाता है। ये रसायन अत्यंत छोटे बर्फ के क्रिस्टल की तरह कार्य करके नमी को आकर्षित करते हैं। इससे संघनन की प्रक्रिया प्रेरित होती हैं।

यह प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही हैं जैसे जब हम पानी की ठंडी बोतल को फ्रीज से निकाल कर बाहर रखते हैं तो उसके चारों ओर हवा में उपस्थित जलवाष्प संघनित होकर बूंद का रूप ले लेती हैं। इसी प्रकार उक्त ठंडे रसायनों से बादलों में उपस्थित जलवाष्प बूंद का रूप लेकर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में नीचे गिरती हैं, जिसे हम वर्षा कहते हैं।


कृत्रिम वर्षा के लिए आवश्यक मौसम

बादलों में पर्याप्त नमी का होना- कृत्रिम वर्षा तभी संभव होती है जब बादलों में पर्याप्त पानी की मात्रा अर्थात नमी की उपस्थिति हो। इसके लिए नींबोस्टेटस बादल सबसे अच्छे माने जाते हैं। ये बादल 500 मीटर से 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। कृत्रिम वर्षा में बादलों में पहले से मौजूद पानी को ही बूंद का रूप दिया जाता हैं। जिससे वह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में वर्षा के रूप में नीचे गिरती हैं। अतः कृत्रिम वर्षा जल का कोई स्रोत नहीं हैं।

कृत्रिम वर्षा का इतिहास

कृत्रिम बारिश का विचार सर्वप्रथम 1891 में लुइस गाथमैन ने दिया। इन्होंने बादलों में तरल कार्बन डाइऑक्साइड डालकर बारिश कराने का सुझाव दिया। 1930 के दशक में बर्गरॉन-फिंडाइसेन प्रक्रिया ने यह सिद्ध किया कि बर्फ के क्रिस्टल बादलों में डालने से बादलों की जलवाष्प ठंडी होकर पानी की बूंदें बारिश में बदल सकती हैं।
लेकिन इसका प्रथम सफल प्रयोग विंसेंट शेफर ने 1946 में शुष्क बर्फ से बर्फ के क्रिस्टल उत्पन्न करके किया।
इसी तकनीक पर 13 नवंबर 1946 को पहली बार न्यूयॉर्क में वायुयान से क्लाउड सीडिंग करके कृत्रिम वर्षा की गई जो कि बर्फबारी के रूप में हुई।
भारत में कृत्रिम वर्षा का इतिहास
सर्वप्रथम तमिलनाडु सरकार ने 1983 में सूखाग्रस्त इलाकों में कृत्रिम बारिश का प्रयोग किया।
इसके उपरांत 2003 और 2004 में कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी इसे अपनाया गया। हाल ही में राजस्थान और दिल्ली में कृत्रिम वर्षा के लिए प्रयास किए गए।

कृत्रिम बारिश का उपयोग

सूखे से निपटने के लिए
पश्चिमी भारत के कुछ राज्यों में जहां बारिश कम होती है वहां पर सूखे की स्थिति से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश का प्रयोग कारगर हो सकता हैं।

जलापूर्ति के लिए
किसी विशेष क्षेत्र में किसी विशिष्ट महत्वपूर्ण जल स्रोत में पानी की आवक बढा़ने तथा कृषि जलापूर्ति के लिए कृत्रिम बारिश का उपयोग किया जा सकता हैं।

प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए
कृत्रिम वर्षा से वायु में उपस्थित प्रदूषकों को हटाकर वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता हैं। भारत में दिल्ली में अत्यधिक वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कृत्रिम वर्षा का उपयोग किया गया। हालांकि इस प्रयोग से वायु में उपस्थित प्रदूषण जल में मिलकर जल और मृदा को प्रदूषण करते हैं।

कोहरे को कम करने के लिए
सर्दी के दिनों में अत्यधिक कोहरे से दृश्यता कम होने से यातायात प्रभावित होता है। कृत्रिम वर्षा तकनीक से कोहरे को वर्षा में बदल कर कम किया जा सकता है।

वन अग्नि के नियंत्रण में
अत्यधिक क्षेत्र में फैली हुई वन अग्नि को नियंत्रित करने के लिए कृत्रिम वर्षा कारगर हो सकती हैं। लेकिन कम व्यवहारिक है क्योंकि अधिकांश वन अग्नि की घटनाएं ग्रीष्म ऋतु में होती है उस समय बादलों में पर्याप्त नमी का अभाव होता हैं।

खेलों के बड़े आयोजन में
बड़े और महत्वपूर्ण खेलों के आयोजन के दौरान वर्षा के व्यवधान को कम करने के लिए पहले से ही कृत्रिम वर्षा करके बादलों की नमी को कम किया जा सकता हैं। जिससे खेलों के आयोजन के दौरान वर्षा की संभावना कम हो जाती हैं। बादलों की गति की दिशा के अनुसार निर्धारित स्थान से पहले ही कृत्रिम वर्षा करके बादलों की नमी कम की जाकर निर्धारित स्थान पर वर्षा को रोका जा सकता हैं।

तापमान में गिरावट लाना
शहरों में भीषण गर्मी और उच्च तापमान से राहत पाने के लिए कृत्रिम वर्षा उपयोगी हो सकती है।

कृत्रिम वर्षा में कितना समय लगता है?

कृत्रिम वर्षा मे क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया के संपन्न होने से 15 मिनट से लेकर 1 घंटे तक का समय लग सकता है।

कृत्रिम वर्षा की सीमाएं

क्योंकि कृत्रिम बारिश की अवधारणा को 100 वर्षों से भी अधिक समय हो चुका है लेकिन अभी भी का उपयोग अत्यधिक सीमित है। उच्च लागत, कम सफलता की दर, सटीक, स्पष्ट और नियंत्रित परिणाम का न होना कृत्रिम वर्षा को अव्यवहारिक बनता है। साथ ही कृत्रिम वर्षा एक स्थाई समाधान नहीं होकर अल्पकालिक राहत होती हैं।
कृत्रिम वर्षा की सीमाएं और चुनौतियां निम्नलिखित है-

उच्च लागत
कृत्रिम वर्षा में विमान, रसायन और तकनीकि के उपकरणों का उपयोग होता हैं। यह कृत्रिम वर्षा की प्रक्रिया को काफी महंगी बना देते हैं जो की लागत के अनुरूप लाभप्रद नहीं होती हैं।

आवश्यक मौसम परिस्थितियॉ
कृत्रिम वर्षा के लिए कुछ विशेष प्रकार की मौसम की परिस्थितियों का होना आवश्यक है। जैसे बादलों की उपस्थिति, बादलों में पर्याप्त नमी, हवा की दिशा और वेग आदि। कई बार क्लाउड सीडिंग के दौरान और उसके तुरन्त बाद हवा की दिशा बदलने से इसके परिणाम पूर्व अनुमानों से भिन्न हो सकते हैं। बादलों की अनुपस्थिति और नमी रहित मौसम में कृत्रिम बारिश करवाना संभव नहीं होता हैं।

सीमित सफलता और दक्षता
कृत्रिम बरसात की सफलता दर काफी कम है। इसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल हैं। कृत्रिम वर्षा अभी भी मौसम विज्ञानियों में बहस का विषय हैं। हालाँकि वर्षा में वृद्धि के सफल मामले सामने आए हैं, लेकिन इन परिणामों की समग्र विश्वसनीयता और पूर्वानुमान अनिश्चित बने हुए हैं। क्लाउड सीडिंग के लिए अभी तक कोई स्पष्ट मानकीकरण के अभाव में इसके परिणामों का निश्चित आकलन नहीं किया जा सकता हैं।

पर्यावरणीय दुष्प्रभाव
वायुमंडल में रसायनों के छिड़काव से कहीं हानिकारक और गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं यद्यपि इसमें प्रयुक्त रसायनों के कोई विषेष साइड इफेक्ट सामने नहीं आए हैं। लेकिन ये जल प्रदूषण अवश्य करते हैं। साथ ही जल में उपस्थित अन्य प्रदूषकों के साथ क्रिया कर द्वितीयक प्रदूषकों का निर्माण कर सकते हैं जो कि अत्यंत विषाक्त और हानिकारक हो सकते हैं। साथ ही कृत्रिम वर्षा जलवायु परिवर्तन में एक योगदान हो सकता हैं।

प्रकृति में हस्तक्षेप
जानबूझकर मौसम में परिवर्तन करना प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना होता है। इसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। जैसे हमेशा के लिए मौसम में नकारात्मक परिवर्तन हो सकते हैं इससे प्राकृतिक वर्षा का पैटर्न और वितरण भी प्रभावित हो सकता है।

नीतिगत और कानूनी बाधाएं
भारत में संसद में कृत्रिम वर्षा अक्सर बहस का विषय होती है। कई लोग और नीति निर्माता कृत्रिम बारिश को अनैतिक मानते हैं। उनका यह भी मानना है कि इसके दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं। इसके लिए अभी तक कोई स्पष्ट नीतिगत और कानूनी प्रावधान नहीं हैं।

क्या कृत्रिम वर्षा हानिकारक हैं?

कृत्रिम वर्षा से पर्यावरण और मौसम संबंधी दुष्प्रभावों और नैतिकता संबंधित मुद्दे हमेशा से बहस के विषय रहे हैं। वायुमंडल में रसायनों का छिड़काव करना एक प्रकार का वायु प्रदूषण है। इसके साथ वर्षा के बाद जल तथा मृदा प्रदूषण भी इसके परिणाम हो सकते हैं। लेकिन इसमें प्रयुक्त रसायन जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड और ठोस CO2 आदि के कोई विशेष पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी हानिकारक प्रभाव नहीं देखे गए हैं । अभी तक के अध्ययनों में यह स्पष्ट नहीं है कि क्लाउड सीडिंग के कोई पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधित जोखिम है अथवा नहीं।

निष्कर्ष

कृत्रिम वर्षा बादलों में उपस्थित नमी को तकनीकी और रसायनों की सहायता से वर्षा का रूप देना होता हैं। कृत्रिम वर्षा तभी संभव है जब बादलों में पर्याप्त नमी हो अर्थात वातावरण में नमी की अनुपस्थिति में कृत्रिम बारिश असंभव हैं। कृत्रिम बारिश अनावृष्टि का कोई स्थाई समाधान न होकर अल्पकालिक राहत है।

कृत्रिम वर्षा का उपयोग कृषि एवं जल स्रोतों में जलापूर्ति और और वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक होती हैं। लेकिन उच्च लागत, कम सफलता की दर, सटीक, स्पष्ट और नियंत्रित परिणामों का न होना कृत्रिम वर्षा को अव्यवहारिक बनाता हैं। कृत्रिम वर्षा के कोई हानिकारक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणाम सामने नहीं आए हैं। लेकिन पर्यावरणीय और नैतिक तौर पर कृत्रिम वर्षा हमेशा विवाद का विषय रहा हैं।


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